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रास्ता नहीं लगता!
आज प्रस्तुत हैं मेरी एक ग़ज़ल के कुछ शेर, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- यहाँ कहीं भी किसी का पता नहीं लगता,ये रास्ता तो मुझे रास्ता नहीं लगता। सुना है लोग बहुत से इधर से गुज़रे हैं,कोई निशान, कोई नक़्श-ए-पा नहीं लगता। कहाँ की मौज, कहाँ का सफर, कहाँ मंज़िलकोई बहाव, कोई सिलसिला नहीं लगता।…
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पीर एक पलती थी!
एक कविता, अंग्रेजी उपन्यास ‘थर्टीन रीज़ंस व्हाई’ पढने के बाद प्रतिक्रिया स्वरूप- हाँ हमारे बीच ही एक पीर पलती थी। सबसे बतियाती, सब अतिक्रमण सहा करती, जैसे भी हो, सबसे घुलमिल कर रहती थी, सहती थी जो कुछ भी बुरा लोग करते थे, बेचारी किससे क्या कुछ कह सकती थी। चली गई, छोडकर वृतांत दुखी…