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धूप !
आज प्रस्तुत है एक गीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- मेघ, पर्वत, वायुमंडल पार करती है, लड़खड़ाती धूप धरती पर उतरती है। चीरकर बादल कभी झरना बनी आती, पर्वतों की बर्फ परबरबस फिसल जातीवृक्ष छतरी मेंकभी कुछ पल उलझ जातीपहुंच आंगन में तनिक आराम करती है। गगनचुंबी भवन में जब यह पहुंच जाती ऊपरी मंज़िलों…
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तेरा मक़्सद है क्या!
तेरा मक़्सद है क्या मैं समझ जाऊँगा,कोई मौसम ही की बात प्यारे उठा| कृष्ण बिहारी नूर
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ज़िंदगी के पुराने !
ऐसा लगता है दोहरा रहा हूँ मैं कुछ,ज़िंदगी के पुराने शुमारे उठा| कृष्ण बिहारी नूर
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रास्ता नहीं लगता!
आज प्रस्तुत हैं मेरी एक ग़ज़ल के कुछ शेर, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- यहाँ कहीं भी किसी का पता नहीं लगता,ये रास्ता तो मुझे रास्ता नहीं लगता। सुना है लोग बहुत से इधर से गुज़रे हैं,कोई निशान, कोई नक़्श-ए-पा नहीं लगता। कहाँ की मौज, कहाँ का सफर, कहाँ मंज़िलकोई बहाव, कोई सिलसिला नहीं लगता।…