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एक गीत बादलों पर
आज प्रस्तुत है एक गीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- कितना पानी भरकर बैठे ये काले बादलजब भी जी चाहे उसको ढरकाते रहते हैं। जब हम घर में रहेंचैन से फिरते रहते हैंजब बाहर निकलेंतब ये हमको धमकाते हैं। जब देखो ये अपनीअकड़ दिखाते रहते हैं। ऐसा नहीं कि सबको ये समान सरसाते हैंकहीं बाढ़…
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उतनी ही हर नदी है!
छोटा बड़ा है पानी ख़ुद अपने हिसाब से,उतनी ही हर नदी है यहाँ जितनी प्यास है| निदा फ़ाज़ली
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इतना भी बन-सँवर के!
इतना भी बन-सँवर के न निकला करे कोई,लगता है हर लिबास में वो बे-लिबास है| निदा फ़ाज़ली
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वही बात ख़ास है!
मुमकिन है लिखने वाले को भी ये ख़बर न हो,क़िस्से में जो नहीं है वही बात ख़ास है| निदा फ़ाज़ली
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यूँ लग रहा है जैसे कोई!
यूँ लग रहा है जैसे कोई आस-पास है,वो कौन है जो है भी नहीं और उदास है| निदा फ़ाज़ली