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टहनी पर फूल जब खिला!
एक बार फिर से आज मैं, श्रेष्ठ हिंदी नवगीत कवि स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का एक नवगीत प्रस्तुत कर रहा हूँ। मालवीय जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का यह नवगीत – टहनी पर फूल जब खिलाहमसे देखा नहीं गया । एक फूल…
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तिरा हम-सफ़र कहाँ है!
उन्हीं रास्तों ने जिन पर कभी तुम थे साथ मेरे,मुझे रोक रोक पूछा तिरा हम-सफ़र कहाँ है| बशीर बद्र
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मैं इसी गुमाँ में बरसों !
मैं इसी गुमाँ में बरसों बड़ा मुतमइन रहा हूँ,तिरा जिस्म बे-तग़य्युर मिरा प्यार जावेदाँ है| बशीर बद्र
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वही ग़म का आसमाँ है!
मिरे साथ चलने वाले तुझे क्या मिला सफ़र में,वही दुख-भरी ज़मीं है वही ग़म का आसमाँ है| बशीर बद्र
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ये जनम जनम का रिश्ता!
कभी पा के तुझ को खोना कभी खो के तुझ को पाना,ये जनम जनम का रिश्ता तिरे मेरे दरमियाँ है| बशीर बद्र
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वो अगर ख़फ़ा नहीं है!
वही शख़्स जिस पे अपने दिल-ओ-जाँ निसार कर दूँ,वो अगर ख़फ़ा नहीं है तो ज़रूर बद-गुमाँ है| बशीर बद्र
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कोई दूसरा कहाँ है!
ये चराग़ बे-नज़र है ये सितारा बे-ज़बाँ है,अभी तुझ से मिलता-जुलता कोई दूसरा कहाँ है| बशीर बद्र
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एक गीत बादलों पर
आज प्रस्तुत है एक गीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- कितना पानी भरकर बैठे ये काले बादलजब भी जी चाहे उसको ढरकाते रहते हैं। जब हम घर में रहेंचैन से फिरते रहते हैंजब बाहर निकलेंतब ये हमको धमकाते हैं। जब देखो ये अपनीअकड़ दिखाते रहते हैं। ऐसा नहीं कि सबको ये समान सरसाते हैंकहीं बाढ़…