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एक पत्ता गलत उठाया था!
आज प्रस्तुत है एक और गीतआप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- आज तक ये मलाल कायम है,एक पत्ता गलत उठाया था। कब समझ साथ सदा देती हैलोभ भी काम किया करता है,आदमी बुद्धिमान कितना हो,भूल तो सुबह-शाम करता है देर तक सालती हैं वे भूलेंखुद को जिनसे न रोक पाया था। जिस तरह बीज फला करते…
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तो धज्जियाँ उड़ जाएँ!
बहुत ग़ुरूर है दरिया को अपने होने पर,जो मेरी प्यास से उलझे तो धज्जियाँ उड़ जाएँ| राहत इंदौरी
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तो पगड़ियाँ उड़ जाएँ!
हवाएँ बाज़ कहाँ आती हैं शरारत से,सरों पे हाथ न रक्खें तो पगड़ियाँ उड़ जाएँ| राहत इंदौरी
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अगर ज़मीन से फूंकें!
रहे ख़याल कि मज्ज़ूब-ए-इश्क़ हैं हम लोग,अगर ज़मीन से फूंकें तो आसमाँ उड़ जाएँ| राहत इंदौरी
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कब कहाँ उड़ जाएँ!
बिखर बिखर सी गई है किताब साँसों की,ये काग़ज़ात ख़ुदा जाने कब कहाँ उड़ जाएँ| राहत इंदौरी
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ज़मीं से एक तअल्लुक़!
ज़मीं से एक तअल्लुक़ ने बाँध रक्खा है,बदन में ख़ून नहीं हो तो हड्डियाँ उड़ जाएँ| राहत इंदौरी
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हैं उतनी तेज़ हवाएँ!
ख़ुदा का शुक्र कि मेरा मकाँ सलामत है,हैं उतनी तेज़ हवाएँ कि बस्तियाँ उड़ जाएँ| राहत इंदौरी