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रे समुंदर, ओ समुंदर!
प्रस्तुत है आज की रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- एक अलग दुनिया है अंदर, रे समुंदर, ओ समुंदर। कैसे इतने शांत बने हो, भीतर पाले हुए बवंडर। तुमसे पार न पाया कोईहो वह पोरस, भले सिकंदर। नैया पार लगे नाविक कीयदि न धरो तुम रूप भयंकर। मछली सभी भांति की पालेरंग-बिरंगी, सुघढ़-मनोहर। कितना व्यापक…