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रूठूँ तो मनाना आए!
काश दुनिया की भी फ़ितरत हो मिरी माँ जैसी,जब मैं बिन बात के रूठूँ तो मनाना आए| अजय सहाब
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हाथों में ख़ज़ाना आए!
काश लौटें मिरे पापा भी खिलौने ले कर,काश फिर से मिरे हाथों में ख़ज़ाना आए| अजय सहाब
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अवशिष्ट!
एक बार फिर से आज मैं, श्रेष्ठ हिंदी लेखक, कवि और संपादक स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। भारती जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी का यह नवगीत- दुख आयाघुट घुटकरमन-मन मैं खीज गया सुख आयालुट लुटकरकन…
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ज़िंदगी उम्र में कुछ!
मैं रहूँ या न रहूँ नाम रहेगा मेरा,ज़िंदगी उम्र में कुछ मुझ से बड़ी लगती है| मुनव्वर राना
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तू मिरे साथ अगर है!
तू मिरे साथ अगर है तो अंधेरा कैसा,रात ख़ुद चाँद सितारों से जड़ी लगती है| मुनव्वर राना
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तिरे ज़ख़्मों के निशाँ!
ख़ुशनुमा लगते हैं दिल पर तिरे ज़ख़्मों के निशाँ,बीच दीवार में जिस तरह घड़ी लगती है| मुनव्वर राना
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अभी दुनिया हमें!
हम भी अपने को बदल डालेंगे रफ़्ता रफ़्ता, अभी दुनिया हमें जन्नत से बड़ी लगती है| मुनव्वर राना
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जैसे सावन के महीने में!
ऐसे रोया था बिछड़ते हुए वो शख़्स कभी,जैसे सावन के महीने में झड़ी लगती है| मुनव्वर राना
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तू जहाँ होता है!
सारी दौलत तिरे क़दमों में पड़ी लगती है,तू जहाँ होता है क़िस्मत भी गड़ी लगती है| मुनव्वर राना