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अपनी सूली अपने काँधे!
क्यूँ शरीक-ए-ग़म बनाते हो किसी को ऐ ‘क़तील’,अपनी सूली अपने काँधे पर उठाओ चुप रहो| क़तील शिफ़ाई
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हफ़्तों उनसे मिले हो गए!
आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ हास्य कवि स्वर्गीय अल्हड़ बीकानेरी जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ। अल्हड़ जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय अल्हड़ बीकानेरी जी की यह हास्य ग़ज़ल – हफ़्तों उनसे मिले हो गए,विरह में पिलपिले हो गए। सदके जूड़ों…
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देख लेना घर से!
देख लेना घर से निकलेगा न हम-साया कोई, ऐ मिरे यारो मिरे दर्द-आश्नाओ चुप रहो| क़तील शिफ़ाई
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इन्हें प्रणाम करो ये -1
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं स्वर्गीय मुकुट बिहारी सरोज जी की व्यंग्य कविता क पहला भाग प्रस्तुत कर रहा हूँ- इन्हें प्रणाम करो ये बड़े महान हैं-1 आशा है आपको यह पसंद आएगा, धन्यवाद । *******
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वक़्त से पहले अँधेरे में!
छट गए हालात के बादल तो देखा जाएगा,वक़्त से पहले अँधेरे में न जाओ चुप रहो| क़तील शिफ़ाई
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ये रात ये चांदनी फिर कहाँ!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं अपने स्वर में फिल्म- जाल का यह गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसे हेमंत कुमार जी ने गाया था- ये रात ये चांदनी फिर कहाँ, सुन जा दिल की दास्तां! आशा है आपको यह पसंद आएगा, धन्यवाद। ********
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सोच की दीवार से!
सोच की दीवार से लग कर हैं ग़म बैठे हुए,दिल में भी नग़्मा न कोई गुनगुनाओ चुप रहो| क़तील शिफ़ाई
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मुझमें तुम गीत बन रहो!
आज फिर से मेरी एक पुरानी रचना प्रस्तुत है, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- मुझमें तुम गीत बन रहो,मन के सुर राग में बंधें। वासंती सारे सपनेपर यथार्थ तेज धूप है,मन की ऊंची उड़ान हैनियति किंतु अति कुरूप है,साथ-साथ तुम अगर चलो,घुंघरू से पांव में बंधें। मरुथल-मरुथल भटक रहीप्यासों की तृप्ति कामना,नियमों के जाल में…
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ख़ुश-नवाओ चुप रहो!
तुम को है मालूम आख़िर कौन सा मौसम है ये,फ़स्ल-ए-गुल आने तलक ऐ ख़ुश-नवाओ चुप रहो| क़तील शिफ़ाई
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आज मौसम पे तब्सिरा कर लें!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से मैं अपनी ही लिखी एक ग़ज़ल के कुछ शेर प्रस्तुत कर रहा हूँ-आज मौसम पे तब्सिरा कर लें! आशा है आपको पसंद आएंगे.धन्यवाद। *******