Category: Uncategorized
-
अंत- रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…
-
मन है भारी!
आज प्रस्तुत है एक गीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- मन है भारी आज सुबह सेये दुश्वारी आज सुबह से। कितने जतन किए बचने केघोड़ों की लगाम कसने के, जितना रोके, उतना भागेमन के अश्व नहीं रुकने के, विचलन मन के हो जाते हैंयहाँ कभी भी किसी वजह से। भागे वहाँ, जिधर कुछ पाएनिर्मोही हम…
-
टूटे हुए पतवार हैं !
टूटे हुए पतवार हैं कश्ती के तो हम क्या,हारी हुई बाहों को ही पतवार बना दे| साहिर लुधियानवी
-
इंसाफ़ तिरे साथ है!
डरता है ज़माने की निगाहों से भला क्यों,इंसाफ़ तिरे साथ है इल्ज़ाम उठा ले| साहिर लुधियानवी