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इतने यक़ीं से हमने!
कुछ समझ कर ही ख़ुदा तुझ को कहा है वर्ना, कौन सी बात कही इतने यक़ीं से हम ने| जाँ निसार अख़्तर
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दास्ताँ अपनी सुनाई है!
जिस जगह पहले-पहल नाम तिरा आता है,दास्ताँ अपनी सुनाई है वहीं से हम ने| जाँ निसार अख़्तर
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दीवाना बने फिरते थे!
वो भी क्या दिन थे कि दीवाना बने फिरते थे,सुन लिया था तिरे बारे में कहीं से हम ने| जाँ निसार अख़्तर
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कितनी शिकनों को!
हौसला खो न दिया तेरी नहीं से हम ने,कितनी शिकनों को चुना तेरी जबीं से हम ने| जाँ निसार अख़्तर
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बात करेंगे हम तो मन की!
आज प्रस्तुत है एक नवगीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- बात करेंगे हम तो मन की गीत कहो, नवगीत कहो तुम, या प्रलाप की रीत कहो तुम, हम को कहते ही रहना है, धारा सा अविरल बहना है। हम मन की गिरहें खोलेंगे धूप दिखाएंगे जीवन की। मन ही है, संपत्ति हमारी सहता सभी विपत्ति…
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उन की ख़ुशी मुझे!
राज़ी हों या ख़फ़ा हों वो जो कुछ भी हों ‘शकील’,हर हाल में क़ुबूल है उन की ख़ुशी मुझे| शकील बदायूनी
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इक शय मिली है!
पाया है सब ने दिल मगर इस दिल के बावजूद,इक शय मिली है दिल में खटकती हुई मुझे| शकील बदायूनी
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यूँ दीजिए फ़रेब!
यूँ दीजिए फ़रेब-ए-मोहब्बत कि उम्र भर,मैं ज़िंदगी को याद करूँ ज़िंदगी मुझे| शकील बदायूनी
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यूँ बन रहा हूँ जैसे!
रोने पे अपने उन को भी अफ़्सुर्दा देख कर,यूँ बन रहा हूँ जैसे अब आई हँसी मुझे| शकील बदायूनी