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हम कहाँ के देवता !
हम कहाँ के देवता हैं बेवफ़ा वो हैं तो क्या,घर में कोई घर की ज़ीनत है चलो यूँ ही सही| निदा फ़ाज़ली
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चलो यूँ ही सही!
आनी जानी हर मोहब्बत है चलो यूँ ही सही,जब तलक है ख़ूबसूरत है चलो यूँ ही सही| निदा फ़ाज़ली
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गोरे बादल, काले बादल!
आज प्रस्तुत है मेरी एक नई रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- गोरे बादल, काले बादल आफत के परकाले बादल। कुछ तो हैं जो दिख भर जाते फिर आगे को हैं बढ जाते कुछ रूई के फाहों जैसे कुछ घनघोर गुनाहों जैसे। कब आते हैं, कब जाते हैं आवारा, मतवाले बादल। मन में लिए प्रतीक्षा…
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न मिले भीक तो!
शर्म आती है कि उस शहर में हम हैं कि जहाँ,न मिले भीक तो लाखों का गुज़ारा ही न हो| जाँ निसार अख़्तर
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दर्द वो दे जो!
ज़िंदगी एक ख़लिश दे के न रह जा मुझ को,दर्द वो दे जो किसी तरह गवारा ही न हो| जाँ निसार अख़्तर
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अश्कों की लकीर!
कभी पलकों पे चमकती है जो अश्कों की लकीर,सोचता हूँ तिरे आँचल का किनारा ही न हो| जाँ निसार अख़्तर
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तू ने पुकारा ही न हो!
दिल को छू जाती है यूँ रात की आवाज़ कभी,चौंक उठता हूँ कहीं तू ने पुकारा ही न हो| जाँ निसार अख़्तर
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प्यार लेकिन जो किया!
यूँ तो एहसान हसीनों के उठाए हैं बहुत,प्यार लेकिन जो किया है तो तुम्हीं से हम ने| जाँ निसार अख़्तर
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इतने यक़ीं से हमने!
कुछ समझ कर ही ख़ुदा तुझ को कहा है वर्ना, कौन सी बात कही इतने यक़ीं से हम ने| जाँ निसार अख़्तर