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गीत अलग ही सुर में!
आज प्रस्तुत है एक ग़ज़ल, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- गीत अलग ही सुर में गाया जा सकता था, पीड़ा का एहसास दबाया जा सकता था। मुख जब दंतविहीन हुआ तब ज्ञान मिला येकोई और जुगाड़ लगाया जा सकता है। दावत खाकर घर आए तब सोचा हमने,छोड़ा बहुत, और कुछ खाया जा सकता था। छूट…
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महानगर का गीत
आज मैं यू ट्यूब पर अपने चैनल के माध्यम से अपना एक और गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ- नींदों में जाग-जागकर, कर्ज सी चुका रहे उमरसडकों पर भाग-भागकर, लडते हैं व्यक्तिगत समर https://studio.youtube.com/video/TVEUuGkbnrE/edit धन्यवाद