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बॉलकनी में वृद्धा!
प्रस्तुत है आज की रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- लोग चांद में बैठी देखते हैंजिस वृद्धा को रात में,मुझे वह सुबह-सवेरेसामने की बॉलकनी मेंदिखाई देती है। पता नहीं कबआ जाती है वहाँ,कोई मिलेचांद की वृद्धा कोपहचानने वालातो पूछूंक्या ये वही है। एक कुर्सी रखी हैबॉलकनी मेंवहीं आकर बैठ जाती हैसुबह-सवेरेमोबाइल भी नहीं होताउसके हाथ…
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हम ने सदियों इन्हीं!
आज इक दाना-ए-गंदुम के भी हक़दार नहीं,हम ने सदियों इन्हीं खेतों पे हुकूमत की है| राहत इंदौरी
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हम ने पलकों के!
सर उठाए थीं बहुत सुर्ख़ हवा में फिर भी,हम ने पलकों के चराग़ों की हिफ़ाज़त की है| राहत इंदौरी
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जब किसी बच्चे ने!
यूँ लगा जैसे कोई इत्र फ़ज़ा में घुल जाए,जब किसी बच्चे ने क़ुरआँ की तिलावत की है| राहत इंदौरी
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जब कभी फूलों ने!
जब कभी फूलों ने ख़ुश्बू की तिजारत की है,पत्ती पत्ती ने हवाओं से शिकायत की है| राहत इंदौरी