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9. झूमती चली हवा
अपने शुरु के ब्लॉग्स में से एक और आज दोहरा रहा हूँ, वैसे यह नौवां ब्लॉग था, और शायद शाहदरा में मेरी प्रवास अवधि के संबंध में अंतिम पड़ाव जैसा था। लगातार सीधी राह पर चलते जाने से भी काफी थकान हो जाती है, अतः थोड़ा इधर-उधर टहल लेते हैं। मैं यह भी बता दूं…
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4. इब्तदा कुछ इस तरह
अपने शुरु के ब्लॉग्स में से एक को आज दोहरा रहा हूँ, वैसे यह चौथा ब्लॉग था, लेकिन इससे मैंने क्रमशः अपनी कहानी सुनाना शुरू किया था। किसी ने फिर न सुना, दर्द के फसाने को मेरे न होने से राहत हुई ज़माने को। खैर दर्द का फसाना सुनाने का मेरा कोई इरादा नहीं है।…
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149. अंतराल- दोहराव
एक वर्ष से कुछ कम समय हुआ है, जब अचानक ब्लॉग लिखने की सनक सवार हुई थी। मैंने शुरुआत की थी, अपने जीवन के प्रारंभ से, कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं, व्यक्तियों आदि का, उनके माध्यम से मेरे जीवन पर पड़े प्रभाव आदि का ज़िक्र करते हुए। शायद 50-60 ब्लॉग, मैंने अपने जीवन के घटनाक्रम को फॉलो…
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148. कच्ची दीवार हूँ, ठोकर न लगाना मुझको
इंसान परिस्थितियों के अनुसार क्या-क्या नहीं बनता और अपने आपको किस-किस रूप में महसूस नहीं करता। कभी-कभी जीवन में ऐसा भी लगता है कि अब बहुत सहन कर लिया, एक झटका और लगा तो टूटकर बिखर जाएंगे। अरेे कुछ नहीं ज़नाब, बस असरार अंसारी जी की एक गज़ल याद आ रही थी, जिसको गुलाम अली…
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147. खुशबू जैसे लोग
अभी कल ही अपने एक पुराने कवि-मित्र का ज़िक्र किया था, मुद्दत हो गई उनसे मिले लेकिन आज भी याद आती है। हाँ कुछ लोग ऐसे भी होते हैं लोग जो लंबे समय बाद भी यादों में खटकते रहते हैं, हालांकि उनको भुला देना ही बेहतर होता है, मैं यह कहना चाहूंगा कि मेरे जीवन…
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146. इस सूने उदास मौसम में, कुछ तो यार करें
आज फिर पुराने दिनों में झांकने का मन हो रहा है, एक मित्र की याद आ रही है। बात है 1980 से 1983 के बीच की, जब मैं आकाशवाणी, जयपुर में अनुवादक के पद पर कार्यरत था और वहाँ बने कवि मित्रों में से एक थे- श्री कृष्ण कल्पित, वे उस समय जयपुर विश्वविद्यालय से…
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145. तेरा दर्द ना जाने कोय
जीवन में अब तक, बहुत से शहरों और क्षेत्रों में रहने का अवसर मिला, हर स्थान की अपनी विशेषता और कमियां हैं। लेकिन कुछ बातें हैं जो भारत में, हर जगह समान रूप से होती हैं। जैसे रात में आप उठें और बाथ-रूम जाएं तो आपको कुत्तों के रोने का शोर सुनाई देगा। यह शोर…
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144. बसंती पागल पवन – राज कपूर
आज एक बार फिर मेरे उस्ताद राज कपूर जी की याद आ रही है, फिल्म- ‘जिस देश में गंगा बहती है’ और उसके एक गीत के बहाने। जबलपुर में जब भेड़ाघाट जाते हैं, तब वहाँ नाव वाले घुमाते हुए बताते हैं, कि यहाँ ‘मेरा नाम राजू’ गाने की शूटिंग हुई थी और यहाँ पद्मिनी ने…
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143. मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
आज एक बार फिर से निदा फाज़ली साहब की एक गज़ल शेयर करने का मन हो रहा है। गज़ल में अपनी बात कहने का सलीका, और जिस बारीकी से फीलिंग्स को कविता में उकेरा जाता है, यह उनकी पहचान रही है। हम सभी इस दुनिया में जी रहे हैं, किसी के पास पैसा है, रुतबा…
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142. देखिये आपने फिर प्यार से देखा मुझको!
आज राज कपूर जी की फिल्म – ‘फिर सुबह होगी’ का एक युगल गीत याद आ रहा है, जिसे साहिर लुधियानवी जी ने लिखा है, खैय्याम जी ने इसका संगीत तैयार किया है और इस गीत को मुकेश जी और आशा भौंसले जी ने गाया है। गीत का विषय, जैसे कि आम तौर पर होता…