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186 . धूल हूँ मैं, वो पवन बसंती!
आज एक बहुत प्यारा गीत शेयर कर रहा हूँ, जो फिल्म ‘धरती कहे पुकार के’ के लिए मुकेश जी ने गाया था। गीत मजरूह सुल्तानपुरी जी ने लिखा था और इसका संगीत दिया था- लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जी की जोड़ी ने। एक और गीत सुना होगा आपने- ‘बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना’, यह गीत भी उस तरह…
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185. ग़म-ए-हयात से कह दो ख़रीद लाये मुझे!
आज फिर से क़तील शिफाई जी की लिखी एक गज़ल आ रही है, खास तौर पर इसका एक शेर- ‘वो मेरा दोस्त है, सारे जहाँ को है मालूम, दग़ा करे वो किसी से तो शर्म आए मुझे! सचमुच बहुत सुंदर भाव है, और यह भी ‘कि संग तुझपे गिरे और ज़ख्म आए मुझे’, वास्तव में…
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184. आ जाए कोई शायद, दरवाज़ा खुला रखना!
आज भूपिंदर सिंह और मीताली सिंह की गाई एक गज़ल शेयर कर रहा हूँ, जिसे क़तील शिफाई जी ने लिखा है और इस गायक जोड़ी ने बड़े सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है। गज़ल में जो मुख्य बातें कही गई हैं, वे इस ओर इशारा करती हैं कि हम दिल में आशा, इंतज़ार और लोगों…
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48. कोई तो आसपास हो, होश-ओ-हवास में !
बिना किसी बहाने के, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग- जब ब्लॉग लिखना शुरू किया था तो यह विचार किया था कि इसमें दलगत राजनीति के बारे में कुछ नहीं लिखूंगा। वैसी कोई बात लिखनी हो तो कहीं और लिख सकता हूँ। लेकिन जैसे राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता, उसी तरह उसके…
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47. छाया मत छूना मन, होगा दुख दूना मन !
आज फिर से आसान वाला रास्ता चुनता हूँ, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग- हाल में हुई एक घटना पर टिप्पणी करने का मन हो रहा है। इस घटना के पात्र हैं सदी के महानायक श्री अमिताभ बच्चन और आज के लोकप्रिय कवि डॉ. कुमार विश्वास । घटना के बारे में चर्चा करने से…
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46. मेरा खयाल है आईने पर गया हूँ मैं!
बहुत से ऐसे ब्लॉग हैं, कि जब मैंने उनको लिखा था, तब उनको पढ़ने वाले ब्लॉगर साथियों से मेरा संपर्क नहीं हुआ था, इसीलिए लीजिए आज फिर से प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग- इस बीच हम गुड़गांव छोड़कर गोआ में आ बसे। यह हमारा नया ठिकाना है और मुझे अभी तक भ्रम रहता है…
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183. इधर भी गधे हैं, उधर भी गधे हैं!
आज स्व. ओम प्रकाश ‘आदित्य’ जी की एक कविता याद आ रही है, जिसके अंत में कवि कहता है कि वो नशे में यह सब कुछ कह गया है, सही बात है, ऐसा नहीं कहेगा तो उस पर कितने सारे मानहानि कि मुकद्मे नहीं हो जाएंगे! लेकिन सच है कि आज के देश के हालात…
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182. टूट जाते हैं जहाँ पर ग्लोब के धागे…
श्री रमेश रंजक जी के एक गीत की पंक्तियां हैं- पेट की पगडंडियों के जाल से आगे, टूट जाते हैं जहाँ पर ग्लोब के धागे, मनुजता की उस सतह पर छोड़ जाते हैं, दिन हमें जो तोड़ जाते हैं, वो इकहरे आदमी से जोड़ जाते हैं। इस कविता में मुख्यतः कहा यही गया है कि…
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181. तुम तरस नहीं खाते, बस्तियाँ जलाने में!
आज डॉ. बशीर बद्र की एक गज़ल याद आ रही है। बशीर बद्र जी शायरी में एक्सपेरिमेंट करने के लिए जाने जाते हैं और काफी नये किस्म के शेर, रवायत से हटकर लिखते रहे हैं। आज की गज़ल का असल में पहला शेर याद आया था, क्योंकि गज़ल में तो यह संभव है कि हर…
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180. मार्ग जिस पर चला नहीं कोई!
आज रॉबर्ट फ्रॉस्ट की लिखी प्रसिद्ध अंग्रेजी कविता ‘द रोड नॉट टेकन’ का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यदि कहीं मूल कथ्य के साथ न्याय न हो पाया हो तो पहले ही क्षमा चाहता हूँ, पर उसके कारण मैं मानता हूँ कि महान रचनाओं के अनुवाद का प्रयास करने संबंधी मेरे उत्साह पर कोई…