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236. चार किताबें पढ़कर ये भी, हम जैसे हो जाएंगे!
निदा फाज़ली साहब की एक गज़ल है- तन्हा तन्हा दुख झेलेंगे महफ़िल महफ़िल गाएँगे जब तक आँसू पास रहेंगे तब तक गीत सुनाएँगे। यह गज़ल पहले भी शायद मैंने शेयर की है, आज इस गज़ल का एक शेर खास तौर पर याद आ रहा था- बच्चों के छोटे हाथों को, चांद सितारे छूने दो, चार…
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102. फिर ख़्वाब अगर हो जाओ तो क्या!
आज फिर से प्रस्तुत है, एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट- एक गज़ल है उबेदुल्लाह अलीम जी की, गुलाम अली जी ने डूबकर गाई है जो बहुत बार सुनी है, बहुत अच्छी लगती है। कुल मिलाकर धार्मिक अंदाज़ में, इसको भी जीवन की नश्वरता से जोड़ा जा सकता है, लेकिन यह कि इस ज़िंदगी को, जो…
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235. जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहाँ हैं!
आज हम वर्ष 2018 में जी रहे हैं, सुना है हिंदुस्तान दुनिया की बड़ी ताक़त बन गया, आर्थिक शक्तिसंपन्न देशों में भारत की गिनती होने लगी है। कितने पैमाने होते हैं किसी देश की तरक्की को मापने, उन सबका उदाहरण देते हुए बताया जाता है कि भारतवर्ष कितना आगे बढ़ गया है! एक बहुत पुराना…
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234. हुई शाम उनका ख़याल आ गया!
हमारी प्राचीन परंपराओं में ऐसा माना जाता रहा है कि सुबह, शाम, रात हर समय का, हर घड़ी का अपना महत्व है, हम हर क्षण का, हर घड़ी का आनंद लेने में, हर अवसर को सेलीब्रेट करने में विश्वास रखते हैं। हमारे यहाँ सुबह के समय जैसे प्रभाती गाई जाती थी, हर घड़ी के अलग-अलग…
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101. आईना हमें देख के हैरान सा क्यों है!
आज फिर से प्रस्तुत है, एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट – एक हिंदी फिल्म आई थी गमन, जिसमें ‘शहरयार’ की एक गज़ल का बहुत खूबसूरत इस्तेमाल किया गया था। वैसे यह गज़ल, आजकल की भागदौड़ भरी ज़िंदगी की घुटन, कुंठाओं आदि का बहुत सुंदर चित्रण करती है। इंसान को भीतर ही भीतर मारने वाली ऐसी…
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233. ये कहानी फिर सही!
ज़िंदगी में अक्सर होता है कि जहाँ प्रेम होता है हम छोटी-छोटी बातों पर शिकायत करते हैं, तब तक, जब तक हमको लगता है कि हमारी शिकायत को कोई असर होगा, उसका कोई अच्छा नतीजा निकलेगा! लेकिन ऐसी स्थिति भी आती है कभी कि इंसान सोचता है कि शिकायत करने का क्या फायदा है। कभी…
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232. लंदन प्रवास की कुछ यादें- चित्रों की ज़ुबानी!
Some memories of London, Scotland visit- https://photos.app.goo.gl/oXfoSqGtPGjz
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99. जार्जेट के पल्ले सी, दोपहर नवंबर की!
आज फिर से प्रस्तुत है, एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट- बहुत बार लोग कविता लिखते हैं मौसम पर, कुछ कविताएं बहुत अच्छी भी लिखी जाती हैं। तुलसीदास जी ने, जब रामचंद्र जी, माता सीता की खोज में लगे थे, उस समय ऋतुओं के बदलने का बहुत सुंदर वर्णन किया है। पूरा मनोविज्ञान भरा है उस…
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98. आंखों में नमी, हंसी लबों पर!
आज फिर से प्रस्तुत है, एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट, संपादित रूप में- बहुत सी बार ऐसा होता है कि कोई कविता शुरू करते हैं, कुछ लाइन लिखकर रुक जाते हैं। फिर आगे नहीं बढ़ पाते, लेकिन वो लाइनें भी दिमाग से नहीं मिट पातीं। कविता की ये पंक्तियां, कभी दीपावली के आसपास लिखी थीं।…
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231. – बंगलौर- एक रुका हुआ शहर?
महान कवि, गीतकार पद्म भूषण गोपाल दास ‘नीरज’ जी नहीं रहे। हिंदी कविता, गीतों, गज़लों और फिल्मी गीतों के क्षेत्र में उन्होंने अपनी अमिट छाप छोड़ी है। उनको विनम्र श्रद्धांजलि के साथ प्रस्तुत है आज की ब्लॉग पोस्ट। पिछले सप्ताह कुछ काम के सिलसिले में बंगलौर जाना हुआ और मैं 3 दिन तक वहाँ रहा।…