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114. वो कर रहा था मुरव्वत भी दिल्लगी की तरह!
कुछ विषय ऐसे हैं, कि जब आपके पास बात करने के लिए कोई विषय न हो, तब आप इनको लेकर अपना स्वेटर या कहें कि आलेख बुन सकते हैं। जैसे एक विषय है मौसम, दूसरा है प्यार! वैसे प्यार कौन नहीं करता और किसका काम चल पाता है बिना प्यार के? लेकिन कविता, गीत, शायरी…
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सुप्रभात
रंग पैराहन का, खुशबू ज़ुल्फ लहराने का नाम, मौसम-ए-गुल है तुम्हारे बाम पर आने का नाम। आपका दिन शुभ हो।
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113. तानसेन
आज तानसेन से जुड़ा एक प्रसंग याद आ रहा है, जो कहीं सुना या पढ़ा था। अकबर के दरबार में तानसेन गाते थे और सभी मंत्रमुग्ध होकर सुनते थे। अकबर उनकी भरपूर तारीफ करते, कहते तानसेन आप कितना सुंदर गाते हो, एक दूसरी ही दुनिया में ले जाते हो। आपके जैसा कोई नहीं है। एक…
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112. बच्चा स्कूल जा रहा है!
आज बिना किसी भूमिका के, निदा फाज़ली साहब की एक नज़्म शेयर कर रहा हूँ, यह नज़्म खुद इतना कहती है कि मैं उसके आगे क्या कह पाऊंगा! बच्चा जब स्कूल जाता है, शिक्षा प्राप्त करता है, अपने लिए और अपने समय के लिए, देश के लिए, दुनिया के लिए सपने बुनता है, उससे ही…
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111. परदेसियों को है एक दिन जाना!
विख्यात फिल्म अभिनेता शशि कपूर नहीं रहे। वैसे तो वे लंबे समय से बीमार थे, काफी दिन पहले जब उनको दादा साहब फाल्के पुरस्कार प्रदान किया गया था, तब वह भी उनके अपने स्थान पर दिया गया था और वे उस समय भी व्हील चेयर पर आए थे। कुछ यह कपूर परिवार में लगभग सभी…
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110. कभी रो के मुस्कुराये, कभी मुस्कुरा के रोये!
हिंदी फिल्मों के कुछ ऐसे पुराने गीत हैं, जो आज की तारीख में भले ही बहुत ज्यादा सुनने को नहीं मिलते हों, लेकिन जब अचानक सुनने को मिल जाते हैं, तो सुनकर लगता है कि क्या शायर ने अपना दिल उंडेलकर रख दिया है और गायक, संगीतकार ने कितने मन से इसको प्रस्तुत किया है।…
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109. एक ज़ख्म भर गया था, इधर ले के आ गया!
आज सुदर्शन फाकिर जी की एक गज़ल के बहाने से बात करते हैं, जिसको जगजीत सिंह जी ने बड़े सुंदर तरीके से गाया है। चलिए पहले यह गज़ल देख लेते हैं- शायद मैं ज़िंदगी की सहर ले के आ गया, क़ातिल को आज अपने ही घर ले के आ गया। ता उम्र ढूंढ़ता रहा मंज़िल…
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108 . जिसकी आवाज़ रुला दे, मुझे वो साज़ न दो!
अपने प्रिय गायक मुकेश जी के दो गीत एक साथ याद आ रहे हैं, एक है- ‘पुकारो मुझे नाम लेकर पुकारो, मुझे इससे अपनी खबर मिल रही है’ और दूसरा है- ‘मुझको इस रात की तनहाई में आवाज़ न दो!’ दो एकदम विपरीत स्थितियां हैं, लेकिन जीवन में लगभग सभी लोग इन एकदम विपरीत मनः…
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107. ये बाज़ी हमने हारी है, सितारो तुम तो सो जाओ!
आज क़तील शिफाई जी की एक गज़ल याद आ रही है, क्या निराला अंदाज़ है बात कहने का! शायर महोदय, जिनकी नींद उड़ गई है परेशानियों के कारण, वो रात भर जागते हैं, आसमान की तरफ देखते रहते हैं और उनको लगता है कि सितारे भी उनके दुख में आज जाग रहे हैं, रोज तो…
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106. मेरे क़ातिल ने कहीं जाम उछाले होंगे!
अभिव्यक्ति, कविता, शेर-ओ-शायरी, ये सब ऐसे काम नहीं है कि जब चाहा लिख लिया और उसमें गुणवत्ता भी बनी रहे। दो शेर याद आ रहे हैं इस संदर्भ में- हम पे दुखों के पर्बत टूटे, तब हमने दो-चार कहे, उसपे भला क्या बीती होगी, जिसने शेर हजार कहे। (डॉ. बालस्वरूप राही) एक अच्छा शेर…