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दीपावली की रात!
प्रस्तुत है आज की रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- रोशनी से धुल गई सारी सियाहीअमावस की इस अंधेरी रात की। चांद बेशक है नहीं, पर छा रहाउल्लसित पावन उजाला, हर तरफहै हमारी आस्था का प्रतिफलन चांदनी का सिलसिला चारों तरफ अमर स्मृतियां हैं हमारे साथ मेंसत्य की जय की, असत की मात की। रात…
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क़फ़स में कह गया!
हवा-ए-ताज़ा दिल को ख़ुद-बख़ुद बेचैन करती है, क़फ़स में कह गया कोई बहार आई है गुलशन में| चकबस्त बृज नारायण
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धूप और शबनम!
गराँ थी धूप और शबनम भी जिन पौदों को गुलशन में,तिरी क़ुदरत से वो फूले-फले सहरा के दामन में| चकबस्त बृज नारायण
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शजर सकते में हैं!
शजर सकते में हैं ख़ामोश हैं बुलबुल नशेमन में,सिधारा क़ाफ़िला फूलों का सन्नाटा है गुलशन में| चकबस्त बृज नारायण
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सिलसिला हवस का!
इक सिलसिला हवस का है इंसाँ की ज़िंदगी,इस एक मुश्त-ए-ख़ाक को ग़म दो-जहाँ के हैं| चकबस्त बृज नारायण
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गुल हैं मगर सताए!
अपना मक़ाम शाख़-ए-बुरीदा* है बाग़ में,गुल हैं मगर सताए हुए बाग़बाँ के हैं| *कटी हुई शाख़ चकबस्त बृज नारायण
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शमएँ ज़मीन की हैं!
हम सोचते हैं रात में तारों को देख कर,शमएँ ज़मीन की हैं जो दाग़ आसमाँ के हैं| चकबस्त बृज नारायण
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एक वो भी दिवाली थी!
आज एक बार फिर मैं आपके लिए अपने यूट्यूब चैनल से, अपने प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक लोकप्रिय गीत अपने स्वर में शेयर कर रहा हूँ- एक वो भी दिवाली थी, एक ये भी दिवाली हैhttps://youtu.be/3DB5YgNnF-E आशा है आपको पसंद आएगाधन्यवाद
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जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना!
आप सभी को ज्योति पर्व दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं। आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय गोपाल दास नीरज जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। नीरज जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गोपाल दास नीरज जी का यह गीत – जलाओ दिए पर रहे ध्यान…
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बुतों को देख के!
बुतों को देख के सब ने ख़ुदा को पहचाना,ख़ुदा के घर तो कोई बंदा-ए-ख़ुदा न गया| यगाना चंगेज़ी