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कोरोना और तब्लीगी जमात!
आज का समय बहुत कठिन समय है, मुझे विश्वास है कि यह समय भी बीत जाएगा, मानव समाज ‘कोरोना वायरस’ नाम की इस मुसीबत पर अंततः विजय प्राप्त करेगा। आज जो लोग यह अनुभव कर रहे हैं, वे आने वाली पीढ़ियों को अपने इस अनुभव के बारे में बताएंगे। कुल मिलाकर क्या कुछ होगा हमारे…
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उतरे कभी ना जो खुमार वो, प्यार है!
आज स्व. नीरज जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। यह एक फिल्मी गीत है, जो उन्होंने फिल्म- प्रेम पुजारी के लिए लिखा था, जिसे एस. डी. बर्मन जी के संगीत निर्देशन में किशोर कुमार जी ने गाया था। इस गीत में नीरज ने प्रेम का एक अनोखा फार्मूला प्रस्तुत किया है। लीजिए प्रस्तुत…
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रंग होगा न बदन होगा न चेहरा होगा!
आज मैं साहिर होशियारपुरी जी की लिखी एक गज़ल शेयर कर रहा हूँ, जिसे जगजीत सिंह जी और चित्रा सिंह जी ने बड़े खूबसूरत अंदाज़ में गाया था। यह एक छोटी सी लेकिन बहुत प्यारी गज़ल है, इसका पहला शेर ही यह बताता है कि जब समय बदलता है तब बहुत कुछ बदल जाता है।…
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हाँफने लगा बूढ़ा आसमान लादे टूटे अणु की धूल- सोम ठाकुर
आज फिर से एक बार मैं अपने प्रिय कवियों मे से एक श्री सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। इस गीत का विषय क्षेत्र काफी व्यापक है, आज की दुनिया जिसमें नफरत हावी है, एटम बम एक हथियार बन गया जिससे देश एक-दूसरे को डराते रहते हैं और पता नहीं कब…
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पवित्रता- रवींद्रनाथ ठाकुर
आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य…
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कोरोना के खतरे के बीच!
आजकल दुनिया भर में फैली कोरोना की महामारी, हजारों लोग इस भयावह रोग की भेंट चढ़ चुके हैं, ऐसे में आज के वातावरण के बारे में कुछ बात करने का मन है। यह एक ऐसा वातावरण है, जिसका अनुभव मुझे तो अपने जीवन-काल में कभी नहीं हुआ है। ऐसी महामारी जो पूरी दुनिया में बुरी…
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आज सड़क के जीव उदास हैं!
आज बाबा नागार्जुन जी की एक प्रसिद्ध कविता याद आ रही है- ‘अकाल और उसके बाद’। इस कविता में अकाल के प्रभाव को बड़े सुंदर तरीके से दर्शाया गया है। जब घर में चूल्हा जलता है तब केवल घर के मानव सदस्य ही तृप्त नहीं होते अपितु ऐसे अनेक जीव भी भोजन पाते हैं, जिनमें…
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पर अपने सपनों को पंख कब मिले!
आज फिर से एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ- बहुत सी बार ऐसा होता है कि कोई कविता शुरू करते हैं, कुछ लाइन लिखकर रुक जाते हैं। फिर आगे नहीं बढ़ पाते, लेकिन वो लाइनें भी दिमाग से नहीं मिट पातीं। कविता की ये पंक्तियां, कभी दीपावली के आसपास ही लिखी…
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केवल कीं नंगी अठखेलियाँ हवा ने!
एक बार फिर से मैं अपने एक प्रिय कवि-नवगीतकार रहे स्व. रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ।हूँ। यह गीत रंजक जी के 1969 में प्रकाशित हुए नवगीत संकलन ‘हरापन नहीं टूटेगा’ से लिया गया है। आजकल दुनिया में जो कोरोना की महामारी फैली है, हजारों लोग इस भयावह रोग की भेंट…