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दर्द पुराने निकले 4
दश्त-ए-तन्हाई ए हिजरा में खड़ा सोचता हूं,हाय क्या लोग मेरा साथ निभाने निकले| अमजद इस्लाम अमजद
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दर्द पुराने निकले 3
दिल ने एक ईंट से तामीर किया ताजमहल,तूने एक बात कही लाख फसाने निकले| अमजद इस्लाम अमजद
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दर्द पुराने निकले 2
फ़स्ल-ए-गुल आई फ़िर एक बार असीनाने-वफ़ा,अपने ही खून के दरिया में नहाने निकले| अमजद इस्लाम अमजद
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दर्द पुराने निकले!
चांद के साथ कई दर्द पुराने निकले,कितने गम थे जो तेरे गम के बहाने निकले| अमजद इस्लाम अमजद
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सोचता हूँ के तुझे हाथ लगा कर देखूं !
आज एक बार फिर से मैं स्वर्गीय राहत इन्दौरी जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| राहत जी अपने सबसे अलग अंदाज़ ए बयां के लिए प्रसिद्ध थे| जो एक अलग प्रकार का ‘पंच’ उनकी रचनाओं में आता था वो पाठकों और श्रोताओं का मन मोह लेता था| लीजिए प्रस्तुत है राहत इन्दौरी साहब…
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खामोशी पहचाने कौन 5
किरन-किरन अलसाता सूरजपलक-पलक खुलती नींदेंधीमे-धीमे बिखर रहा हैज़र्रा-ज़र्रा जाने कौन । निदा फाज़ली
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खामोशी पहचाने कौन 4
मैं उसकी परछाई हूँ यावो मेरा आईना हैमेरे ही घर में रहता हैमेरे जैसा जाने कौन । निदा फाज़ली
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खामोशी पहचाने कौन 3
जाने क्या-क्या बोल रहा थासरहद, प्यार, किताबें, ख़ूनकल मेरी नींदों में छुपकरजाग रहा था जाने कौन । निदा फाज़ली
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खामोशी पहचाने कौन 2
सदियों-सदियों वही तमाशारस्ता-रस्ता लम्बी खोजलेकिन जब हम मिल जाते हैंखो जाता है जाने कौन । निदा फाज़ली
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ख़ामोशी पहचाने कौन 1
मुँह की बात सुने हर कोईदिल के दर्द को जाने कौनआवाज़ों के बाज़ारों मेंख़ामोशी पहचाने कौन । निदा फाज़ली