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मंदिर में दीप !
देखूँ तेरे हाथों को तो लगता है तेरे हाथमंदिर में फ़क़त दीप जलाने के लिए हैं| जां निसार अख़्तर
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ख़्वाब!
आँखों में जो भर लोगे तो काँटों से चुभेंगेये ख़्वाब तो पलकों पे सजाने के लिए हैं| जां निसार अख़्तर
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कोई शहर से आया होगा!
आज विख्यात अभिनेत्री शबाना आज़मी के पिता और हमारे देश के जाने माने शायर ज़नाब कैफ़ी आज़मी साहब की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूं| कैफ़ी आज़मी साहब को एक विद्रोही शायर के रूप में भी जाना जाता है| एक अनोखा ही अंदाज़ था उनका बात कहने का, जैसे ‘तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो,…
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आवारगी 6
कल रात तनहा चाँद को देखा था मैंने ख़्वाब में‘मोहसिन’ मुझे रास आएगी शायद सदा आवारगी। मोहसिन नक़वी
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आवारगी 5
ये दर्द की तनहाइयाँ, ये दश्त का वीराँ सफ़रहम लोग तो उकता गये अपनी सुना, आवारगी। मोहसिन नक़वी
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आवारगी 4
इक अजनबी झोंके ने जब पूछा मेरे ग़म का सबबसहरा की भीगी रेत पर मैंने लिखा आवारगी। मोहसिन नक़वी