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ये असंगति जिन्दगी के द्वार सौ-सौ बार रोई!
स्वर्गीय भारत भूषण जी हिन्दी काव्य मंचों के ऐसे दिव्य हस्ताक्षर थे कि जिनकी उपस्थिति काव्य मंच को गरिमा प्रदान करती थी| उनके अनेक गीत मैंने पहले शेयर की हैं ‘मैं बनफूल भला मेरा कैसा खिलना क्या मुरझाना’, ‘चक्की पर गेहूं लिए खड़ा, मैं सोच रहा उखड़ा उखड़ा, क्यों दो पाटों वाली चाकी बाबा कबीर…
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चाल ऐसी है मदहोश मस्ती भरी!
चाल ऐसी है मदहोश मस्ती भरीनींद सूरज सितारों को आने लगीइतने नाज़ुक क़दम चूम पाये अगरसोते सोते बियाबान गाने लगेमत महावर रचाओमत महावर रचाओ बहुत पाँव मेंफर्श का मरमरी दिल बहल जाएगा| नई उमर की नई फसल
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सुर्ख होठों पे उफ़ ये हँसी मदभरी!
सुर्ख होठों पे उफ़ ये हँसी मदभरीजैसे शबनम अंगारो की मेहमान होजादू बुनती हुई ये नशीली नज़रदेख ले तो खुदाई परेशान होमुस्कुराओ न ऐसेमुस्कुराओ न ऐसे चुराकर नज़रआइना देख सूरत मचल जाएगा| नई उम्र की नई फसल
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ये शरमसार मौसम बदल जाएगा!
साँस की तो बहुत तेज़ रफ़्तार हैऔर छोटी बहुत है मिलन की घडीगूंथते गूंथते ये घटा साँवरीबुझ न जाए कही रूप की फुलझड़ीचूड़ियाँ ही न तुमचूड़ियाँ ही न तुम खनखनाती रहोये शरमसार मौसम बदल जाएगा| नई उमर की नई फसल
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देखती ही रहो आज दर्पण ना तुम !
देखती ही रहो आज दर्पण ना तुम प्यार का ये महूरत निकल जाएगादेखती ही रहो आज दर्पण ना तुमप्यार का ये महूरत निकल जाएगा| नई उम्र की नई फसल
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पी जा हर अपमान!
आज एक बार फिर गीतों की दुनिया के एक पुराने हस्ताक्षर स्वर्गीय बाल स्वरूप ‘राही’ जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ | राही जी ने कुछ बहुत अच्छे गीतों और ग़ज़लों का उपहार हमें दिया है| उनको कवि सम्मेलनों में सुनने का भी अवसर मुझे मिला था, उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी…
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सारा जहां हमारा 6
पतला है हाल-ए-अपना, लेकिन लहू है गाढ़ाफौलाद से बना है, हर नौजवाँ हमारा| मिल-जुलके इस वतन को, ऐसा सजायेंगे हमहैरत से मुँह तकेगा सारा जहाँ हमारा| चीन-ओ-अरब हमारा … वो सुबह कभी तो आएगी
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सारा जहां हमारा 5
तालीम है अधूरी, मिलती नही मजूरीमालूम क्या किसीको, दर्द-ए-निहाँ हमाराचीन-ओ-अरब हमारा … फिर सुबह होगी