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महताब के खंज़र की तरह!
तुम नहीं आए अभी, फिर भी तो तुम आए होरात के सीने में महताब के खंज़र की तरहसुब्हो के हाथ में ख़ुर्शीद के सागर की तरह| अली सरदार जाफ़री
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तब भी तो तुम आए थे!
जब नहीं आए थे तुम, तब भी तो तुम आए थेआँख में नूर की और दिल में लहू की सूरतयाद की तरह धड़कते हुए दिल की सूरत| अली सरदार जाफरी
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अब मुझे चमन से क्या लेना!
आज मैं मुकेश जी और लता जी का गाया एक युगल गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ, यह गीत 1971 में रिलीज हुई फिल्म- पारस के लिए लता जी और मुकेश जी ने कल्याणजी-आनन्दजी के संगीत निर्देशन में गाया था और इसे लिखा था इंदीवर जी ने| यह रोमांटिक गीत आज भी श्रोताओं को अपनी मधुरता…
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तुम मेरी ग़ज़लें गाओगे!
बेचैनी जब बढ जायेगी और याद किसी की आयेगी,तुम मेरी ग़ज़लें गाओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जायेगा| सईद राही
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तुम भी घर देर से आओगे!
जब सूरज भी खो जायेगा और चाँद कहीं सो जायेगा,तुम भी घर देर से आओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जायेगा| सईद राही
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आईने से घबराओगे!
तनहाई के झूले झूलोगे, हर बात पुरानी भूलोगेआईने से घबराओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जायेगा सईद राही
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तावीज़ें भी बँधवाओगे!
हर बात गवारा कर लोगे, मन्नत भी उतारा कर लोगे,तावीज़ें भी बँधवाओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जायेगा| सईद राही
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जब इश्क़ तुम्हें हो जायेगा!
मेरे जैसे बन जाओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जायेगा,दीवारों से टकराओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जायेगा| सईद राही
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चारागर भी पुराना चाहिए था!
अपनी ग़ज़लों में एक खास तरह का ‘पंच’ लेकर आने वाले स्वर्गीय राहत इन्दौरी जी की एक ग़ज़ल आज शेयर कर रहा हूँ| राहत जी अक्सर अपने श्रोताओं को चौंका देते थे, ऐसी कोई बात अपनी शायरी में लेकर आते थे| लीजिए आज प्रस्तुत है, स्वर्गीय राहत इन्दौरी जी की यह ग़ज़ल- वफ़ा को आज़माना…
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हम कि रूठी हुई रुत को भी मना लेते थे!
हम कि रूठी हुई रुत को भी मना लेते थे,हम ने देखा ही न था मौसम-ए-हिज्राँ जाना| अहमद फ़राज़