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दोपहर न भाये मुझे!
मैं अपने पाँव तले रौंदता हूँ साये कोबदन मेरा ही सही दोपहर न भाये मुझे। क़तील शिफ़ाई
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सौ बार आज़माये मुझे!
वो महरबाँ है तो इक़रार क्यूँ नहीं करतावो बदगुमाँ है तो सौ बार आज़माये मुझे। क़तील शिफ़ाई
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कि संग तुझपे गिरे और ज़ख़्म आये मुझे!
ये मोजज़ा भी मुहब्बत कभी दिखाये मुझेकि संग तुझपे गिरे और ज़ख़्म आये मुझे। क़तील शिफाई
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जग में रह जाएंगे, प्यारे तेरे बोल!
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज फिर से मैं हम सबके प्यारे मुकेश जी का एक बहुत प्यारा गीत शेयर कर रहा हूँ, और इस गीत के माध्यम से ही मैं मुकेश जी, राज कपूर साहब और मजरूह सुल्तानपुरी साहब को भी याद कर…
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चलो अब यादगारों की अंधेरी कोठरी खोलें!
चलो अब यादगारों की अंधेरी कोठरी खोलें,कम-अज़-कम एक वो चेहरा तो पहचाना हुआ होगा। दुष्यंत कुमार
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किस तरह जलसा हुआ होगा !
यहाँ तो सिर्फ़ गूंगे और बहरे लोग बसते हैंख़ुदा जाने यहाँ पर किस तरह जलसा हुआ होगा । दुष्यंत कुमार
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ऐसा नहीं ऐसा हुआ होगा!
कई फ़ाक़े बिता कर मर गया जो उस के बारे मेंवो सब कहते हैं अब ऐसा नहीं ऐसा हुआ होगा। दुष्यंत कुमार
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कोई हांका हुआ होगा!
तुम्हारे शहर में ये शोर सुन सुन कर तो लगता हैकि इंसानों के जंगल में कोई हांका हुआ होगा। दुष्यंत कुमार
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वहां पर क्या हुआ होगा!
ग़ज़ब ये है की अपनी मौत की आहट नहीं सुनतेवो सब के सब परेशां हैं वहां पर क्या हुआ होगा। दुष्यंत कुमार
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पानी कहां ठहरा हुआ होगा!
यहां तक आते आते सूख जाती है कई नदियां मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा। दुष्यंत कुमार