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समय की शिला पर मधुर चित्र कितने!
आज हिन्दी के प्रतिष्ठित कवि और नवगीत आंदोलन के प्रणेता स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| इत्तेफाक से मैं कभी उनके कभी दर्शन नहीं कर पाया लेकिन किसी रचनाकार से असली जुड़ाव तो उसकी रचनाओं के माध्यम से ही होता है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का…
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मेरा अंगूठा काट जाती है!
किसी कुटिया को जब “बेकल”महल का रूप देता हूँ,शंहशाही की ज़िद्द मेरा अंगूठा काट जाती है| बेकल उत्साही
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गर्मी का महीना काट जाती है!
तेरी वादी से हर इक साल बर्फ़ीली हवा आकर,हमारे साथ गर्मी का महीना काट जाती है| बेकल उत्साही
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पत्ता काट जाती है!
अजब है आजकल की दोस्ती भी, दोस्ती ऐसी,जहाँ कुछ फ़ायदा देखा तो पत्ता काट जाती है| बेकल उत्साही
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कैंची लिफ़ाफ़ा काट जाती है!
पहुँच जाती हैं दुश्मन तक हमारी ख़ुफ़िया बातें भी,बताओ कौन सी कैंची लिफ़ाफ़ा काट जाती है| बेकल उत्साही
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मेरा रस्ता काट जाती है!
ये दुनिया तुझसे मिलने का वसीला काट जाती है,ये बिल्ली जाने कब से मेरा रस्ता काट जाती है| बेकल उत्साही