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छू सकता न था!
वो के ख़ुशबू की तरह फैला था मेरे चार सू,मैं उसे महसूस कर सकता था छू सकता न था| अदीम हाशमी
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वो मेरा न था!
फ़ासले ऐसे भी होंगे ये कभी सोचा भी न था,सामने बैठा था मेरे, और वो मेरा न था| अदीम हाशमी
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संध्या सिंदूर लुटाती है!
एक बार फिर से मैं आज हिन्दी काव्य मंचों पर अपने गीतों के माध्यम से श्रोताओं को झूमने पर मजबूर कर देने वाले स्वर्गीय हरिवंश राय बच्चन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| इस गीत में बच्चन जी ने शाम के कुछ बहुत सुंदर चित्र प्रस्तुत किए हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है, स्वर्गीय…