Category: Uncategorized
-
कहीं मस्जिद कहीं मंदिर क्यूँ है!
आज मैं सुदर्शन फाक़िर जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| फाक़िर साहब ने बहुत अच्छी शायरी की है, उनकी बहुत सी ग़ज़लें प्रसिद्ध गायकों ने गयी हैं, जैसे कुछ शेर मुझे याद या रहे हैं- अगर हम कहें और वो मुस्कुरा दें, हम उनके लिए ज़िंदगानी लुटा दें| ***** ग़म बढे़ आते हैं…
-
कोई भी चारा न था!
याद करके और भी तकलीफ़ होती थी ‘अदीम’,भूल जाने के सिवा अब कोई भी चारा न था| अदीम हाशमी
-
शहर धुँधलाया न था!
ये भी सब वीरानियाँ उस के जुदा होने से थीं,आँख धुँधलाई हुई थी, शहर धुँधलाया न था| अदीम हाशमी
-
तू सोया न था!
आज मिलने की ख़ुशी में सिर्फ़ मैं जागा नहीं,तेरी आँखों से भी लगता है कि तू सोया न था| अदीम हाशमी
-
कोई तेरे जैसा न था!
मैं तेरी सूरत लिए सारे ज़माने में फिरा,सारी दुनिया में मगर, कोई तेरे जैसा न था| अदीम हाशमी
-
मेरे साथ वो रोया न था!
आज उसने दर्द भी अपने अलहदा कर दिए,आज मैं रोया तो मेरे साथ वो रोया न था| अदीम हाशमी
-
तेरा चेहरा न था!
अक्स तो मौजूद था पर अक्स तनहाई का था,आईना तो था मगर उसमें तेरा चेहरा न था| अदीम हाशमी