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आपके टुकड़ों के टुकड़े —
आपके टुकड़ों के टुकड़े कर दिये जायेंगे पर,आपकी ताज़ीम में कोई कसर होगी नहीं| दुष्यंत कुमार
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पत्थरों में चीख़ हर्गिज़—
आज मेरा साथ दो वैसे मुझे मालूम है,पत्थरों में चीख़ हर्गिज़ कारगर होगी नहीं| दुष्यंत कुमार
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उनको ख़बर होगी नहीं!
बूँद टपकी थी मगर वो बूँद – ओ -बारिश और है,ऐसी बारिश की कभी उनको ख़बर होगी नहीं| दुष्यंत कुमार
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इन ठिठुरती उँगलियों को—
इन ठिठुरती उँगलियों को इस लपट पर सेंक लो,धूप अब घर की किसी दीवार पर होगी नहीं| दुष्यंत कुमार
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ऐसे गुज़र होगी नहीं!
पक गई हैं आदतें बातों से सर होंगी नहीं,कोई हंगामा करो ऐसे गुज़र होगी नहीं| दुष्यंत कुमार
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यह श्वान – रवींद्रनाथ ठाकुर
आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य…
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आज क्यों शर्मा रहा हूँ!
भरम तेरे सितम का खुल चुका है,मैं तुझसे आज क्यों शर्मा रहा हूँ| फ़िराक़ गोरखपुरी