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चले जाते हैं अपनी धुन में!
हम कहीं और चले जाते हैं अपनी धुन में,रास्ता है कि कहीं और चला जाता है| सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
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फिर-फिर वही सन्नाटा है!
देखिए तो वही बहकी हुई हवाएँ हैं,फिर वही रात है, फिर-फिर वही सन्नाटा है| सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
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शोर उठता है कहीं दूर
शोर उठता है कहीं दूर क़ाफिलों का-सा,कोई सहमी हुई आवाज़ में बुलाता है| सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
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द्वार मेरा कोई उस वक्त—
होश अपना भी रहता नहीं मुझे जिस वक्त,द्वार मेरा कोई उस वक्त खटखटाता है| सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
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कोई लौट-लौट जाता है!
जागिए तो यहाँ मिलती नहीं आहट कोई,नींद में जैसे कोई लौट-लौट जाता है| सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
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जी यहाँ घबराता है!
अजनबी देश है यह, जी यहाँ घबराता है,कोई आता है यहाँ पर न कोई जाता है| सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
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रुला के गया, सपना मेरा!
कल मैंने भारतीय सिनेमा जगत के दो महान व्यक्तित्वों – राज कपूर जी को उनके जन्म दिन पर और उनके साथी और महान जनकवि शैलेन्द्र जी को उनकी पुण्य तिथि पर याद किया था| कल मैंने राज साहब की फिल्म – ‘मेरा नाम जोकर’ का एक गीत भी उनकी स्मृति में शेयर किया था| आज…