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मौत का मंतर न फेंक!
हो सके तो चल किसी की आरजू के साथ-साथ,मुस्कराती ज़िंदगी पर मौत का मंतर न फेंक| कुंवर बेचैन
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चहचहाती बुलबुलों पर—
दो दिलों के दरमियाँ दीवार-सा अंतर न फेंक,चहचहाती बुलबुलों पर विषबुझे खंजर न फेंक| कुंवर बेचैन
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बस यही एक पल है!
आज मैं 1965 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘वक़्त’ का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| फिल्मी गीतों में सभी प्रकार के दर्शन, हर प्रकार के विचारों, फलसफ़ों को अभिव्यक्ति दी जाती है, जैसे जो पार्टी एनिमल कहे जाते हैं, विलन और वेंप होते हैं, उनका अलग फलसफ़ा होता है| ऐसा ही फलसफ़ा इस गीत में…
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आग जलनी चाहिए!
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए| दुष्यंत कुमार
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ये सूरत बदलनी चाहिए!
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए| दुष्यंत कुमार
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हर लाश चलनी चाहिए!
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए| दुष्यंत कुमार
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बुनियाद हिलनी चाहिए!
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए| दुष्यंत कुमार
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हो गई है पीर पर्वत-सी!
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए| दुष्यंत कुमार
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फसल काटती लड़की का गीत
एक बार फिर से मैं अपनी एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट दोहरा रहा हूँ, जो मेरे द्वारा किया गया एक प्रसिद्ध कविता का भावानुवाद है| आज विलियम वर्ड्सवर्थ की एक प्रसिद्ध कविता का सहज अनुवाद, हिंदी में प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा हूँ। यह अत्यंत प्रसिद्ध रचना है, संभव है इस अनुवाद में कोई कमी…
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आप ही समझाता है !
दिल को नासेह की ज़रूरत है न चारागर की,आप ही रोता है औ आप ही समझाता है । सर्वेश्वर दयाल सक्सेना