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शायद अपनी शिद्दत-ए-इज़हार थोड़ी कम रही!
आज एक बार फिर से मैं श्रेष्ठ शेयर और ग़ज़ल लेखक राजेश रेड्डी जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| राजेश जी की कुछ ग़ज़लें मैंने पहले भी शेयर की हैं| आज की ग़ज़ल में उन्होंने यह व्यक्त किया है कि वर्तमान समय में लोगों को प्रभावित करने के लिए सच में झूठ की…
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अब तक वो ठिकाना याद है!
चोरी-चोरी हम से तुम आ कर मिले थे जिस जगह,मुद्दतें गुज़रीं पर अब तक वो ठिकाना याद है| हसरत मोहानी
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मुझको भी रुलाना याद है!
आ गया गर वस्ल की शब भी कहीं ज़िक्रे-फ़िराक़,वो तेरा रो-रो के मुझको भी रुलाना याद है| हसरत मोहानी
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हाले दिल बातों ही बातों में–
तुझको जब तन्हा कभी पाना तो अज़ राहे-लिहाज़,हाले दिल बातों ही बातों में जताना याद है| हसरत मोहानी
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मुँह छुपाना याद है!
खेंच लेना वो मेरा परदे का कोना दफ़अतन,और दुपट्टे से तेरा वो मुँह छुपाना याद है| हसरत मोहानी
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दांतों में वो उंगली दबाना याद है|!
तुझसे मिलते ही वो बेबाक हो जाना मेरा,और तेरा दांतों में वो उंगली दबाना याद है| हसरत मोहानी