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युद्ध – 3
टैंक आगे बढे कि पीछे हटें,कोख धरती की बांझ होती है !फतह का जश्न हो कि हार का सोग,जिंदगी मय्यतों पे रोती है ! साहिर लुधियानवी
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युद्ध – 2
बम घरों पर गिरे कि सरहद पर ,रूह-ऐ-तामीर जख्म खाती है !खेत अपने जले कि औरों के ,जीस्त फ़ाकों से तिलमिलाती है ! साहिर लुधियानवी
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युद्ध-1
खून अपना हो या पराया होनस्ल-ए-आदम का खून है आख़िर,जंग मशरिक में हो या मगरिब में ,अमन-ऐ-आलम का खून है आख़िर ! साहिर लुधियानवी
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‘यदि’ – रुड्यार्ड किप्लिंग की कविता
आज फिर से एक पुरानी पोस्ट दोहरा रहा हूँ, जो मेरे द्वारा किया गया एक अनुवाद है| आज, मैं विख्यात ब्रिटिश कवि रुड्यार्ड किप्लिंग की एक कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। श्री किप्लिंग एक ब्रिटिश कवि थे लेकिन उनका जन्म ब्रिटिश शासन के दौरान, मुम्बई में ही हुआ था। यह उनकी अंग्रेजी भाषा…