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फिर ज़मीं पर कहीं–
जब हक़ीक़त है के हर ज़र्रे में तू रहता है,फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं मंदिर क्यूँ है| सुदर्शन फाक़िर
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हर इक हाथ में पत्थर क्यूँ है!
आज के दौर में ऐ दोस्त ये मंज़र क्यूँ है,ज़ख़्म हर सर पे, हर इक हाथ में पत्थर क्यूँ है| सुदर्शन फाक़िर
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कि मैं ज़िन्दा हूँ अभी!
ज़हर पीने की तो आदत थी ज़माने वालोंअब कोई और दवा दो कि मैं ज़िन्दा हूँ अभी| सुदर्शन फाक़िर
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क़ातिल की निगाहों की तरह!
ग़म बढे़ आते हैं क़ातिल की निगाहों की तरह,तुम छिपा लो मुझे, ऐ दोस्त, गुनाहों की तरह| सुदर्शन फाक़िर
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भाषा वंदना
आदरणीय सोम ठाकुर जी का बहुत प्रसिद्ध गीत है जो हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी की वंदना का गीत है| हिन्दी की समृद्ध परंपरा और शक्ति का जो वर्णन इस गीत में बहुत सहज भाव से कर दिया गया है, उसका वर्णन करने में विद्वानों को काफी लंबा विवरण देना पड़ता है| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री…
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दिल पत्थर कर दे या अल्लाह!
या धरती के ज़ख़्मों पर मरहम रख दे,या मेरा दिल पत्थर कर दे या अल्लाह| क़तील शिफ़ाई
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कोई सहर दे या अल्लाह!
सूरज सी इक चीज़ तो हम सब देख चुके,सचमुच की अब कोई सहर दे या अल्लाह| क़तील शिफ़ाई
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फिर चाहे दीवाना कर दे!
दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह,फिर चाहे दीवाना कर दे या अल्लाह| क़तील शिफ़ाई