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मैं राह-नुमाओं में!
मैं राह-नुमाओं में नहीं मान मिरी बात,मैं भी हूँ इसी दश्त का सौदाई इधर आ। मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
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इन अंधेरी घाटियों के!
आज प्रस्तुत है मेरी एक नई रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- इन अंधेरी घाटियों के पार जाना हैवक़्त तो इसमें लगेगा । आज की दुनिया बहुत खूंख्वार लगती है, आदमीयत पर खिंचीतलवार लगती है, इस व्यवस्था का कोई उपचार लाना हैप्रेम क्या संभव करेगा। मानते जो स्वयं को सिरमौर दुनिया का,पालने में पालतेआतंक के…
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मुझ को भी ये दुनिया!
सुनता हूँ कि तुझ को भी ज़माने से गिला है,मुझ को भी ये दुनिया नहीं रास आई इधर आ। मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
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मिल बाँट के रो लें!
मुझ को भी ये लम्हों का सफ़र चाट रहा है, मिल बाँट के रो लें ऐ मिरे भाई इधर आ। मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
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यूँ तोड़ न मुद्दत की!
यूँ तोड़ न मुद्दत की शनासाई इधर आ,आ जा मिरी रूठी हुई तन्हाई इधर आ। मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
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यारों के इल्तिफ़ात!
लगता है उस की बातों से ये ‘शहरयार’ भी’यारों के इल्तिफ़ात का मारा हुआ सा है| शहरयार
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तुमसे नाराज़ तो नहीं हूँ मैं!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं अपने स्वर में स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक श्रेष्ठ नवगीत प्रस्तुत कर रहा हूँ – फैली है दूर तक परेशानी, तिनके सा तिरता हूँ तो क्या हैतुमसे नाराज़ तो नहीं हूँ मैं आशा है आपको पसंद आएगाधन्यवाद।
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नज़राना तेरे हुस्न को!
नज़राना तेरे हुस्न को क्या दें कि अपने पास,ले दे के एक दिल है सो टूटा हुआ सा है| शहरयार
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क्या हादिसा हुआ है !
क्या हादिसा हुआ है जहाँ में कि आज फिर,चेहरा हर एक शख़्स का उतरा हुआ सा है| शहरयार