Category: Uncategorized
-
क्या जुर्म है पता ही नहीं!
ज़िन्दगी से बड़ी सज़ा ही नहीं,और क्या जुर्म है पता ही नहीं। कृष्ण बिहारी ‘नूर’
-
नाम-धाम से काम का क्या है सामंजस्य?
आज एक बार फिर से हिन्दी काव्य मंचों पर किसी समय हास्य कविताओं का पर्याय बने रहे स्वर्गीय काका हाथरसी जी की एक प्रसिद्ध कविता शेयर कर रहा हूँ| इस कविता में एक सौ आठ नामों के माध्यम से बताया गया है कि किसी व्यक्ति के नाम और उसके काम में तालमेल होना अक्सर संयोग…
-
हँसाते-हँसाते रूलाया गया हूँ !
स्वर्गीय बलबीर सिंह ‘रंग’ जी हिन्दी साहित्य मंच के एक अनूठे कवि थे, उनकी अभिव्यक्ति शैली अलग तरह की थी, अक्सर एक कवि के रूप में वे अपनी बात करते थे, आज भी मैं ‘आत्माभिव्यक्ति शैली में मैं लिखी गई उनकी एक कविता शेयर कर रहा हूँ| लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय बलबीर सिंह ‘रंग’ जी…
-
कभी आ के चुरा ले मुझको!
मैं खुले दर के किसी घर का हूँ सामां प्यारे,तू दबे पाँव कभी आ के चुरा ले मुझको| क़तील शिफ़ाई
-
जूड़े में सजा ले मुझको!
मैं जो कांटा हूँ तो चल मुझसे बचाकर दामन,मैं हूँ गर फूल तो जूड़े में सजा ले मुझको| क़तील शिफ़ाई