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चलती नटनी जैसी मां!
बीवी, बेटी, बहन, पड़ोसन,थोड़ी थोड़ी सी सब में|दिन भर इक रस्सी के ऊपर, चलती नटनी जैसी मां| निदा फ़ाज़ली
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मुर्ग़े की आवाज़ से खुलती!
चिड़ियों के चहकार में गूंजे, राधा-मोहन अली-अली|मुर्ग़े की आवाज़ से खुलती, घर की कुंडी जैसी मां | निदा फ़ाज़ली
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आधी सोई आधी जागी!
बाँस की खुर्री खाट के ऊपर, हर आहट पर कान धरे|आधी सोई आधी जागी,थकी दोपहरी जैसी मां | निदा फ़ाज़ली
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बेसन की सोंधी रोटी पर!
बेसन की सोंधी रोटी पर, खट्टी चटनी जैसी मां,याद आती है चौका-बासन, चिमटा फुकनी जैसी मां | निदा फ़ाज़ली
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आँधियों ने गोद में हमको खिलाया है !
आज मैं हिन्दी के श्रेष्ठ रचनाकार और कादंबिनी पत्रिका के यशस्वी संपादक रहे स्वर्गीय रामानंद दोषी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| दोषी जी का गीत ‘मन होता है पारा, ऐसे देखा नहीं करो’ बहुत प्रसिद्ध हुआ था| इस रचना में दोषी जी ने हमारे महान राष्ट्र की गौरव वंदना बड़े श्रेष्ठ तरीके…
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कोई दरीचा खुला न था!
राशिद किसे सुनाते गली में तेरी गज़ल,उसके मकां का कोई दरीचा खुला न था। मुमताज़ राशिद
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हवा का पता न था!
पत्तों के टूटने की सदा घुट के रह गई,जंगल में दूर-दूर, हवा का पता न था। मुमताज़ राशिद
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उधर रास्ता न था!
पत्थर सुलग रहे थे कोई नक्श-ए-पा न था,हम जिस तरफ़ चले थे उधर रास्ता न था। मुमताज़ राशिद
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कौन थकान हरे जीवन की?
अज्ञेय जी द्वारा संपादित तारसप्तक के माध्याम से हिन्दी में नई कविता का युग प्रारंभ हुआ था, इसमें संकलित कवियों के संबंध मे अज्ञेय जी ने लिखा था कि वे एक दूसरे से और एक दूसरे के कुत्तों से भी नफरत करते हैं, परंतु वे सभी कविता के नए युग के प्रतिनिधि हैं| तारसप्तक के…