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गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता- व्यापारी
एक बार फिर मैं आज एक पुरानी पोस्ट शेयर कर रहा हूँ| लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं भारत के नोबल पुरस्कार कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया…
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मेरी बूढ़ी नानी रहती थीं!
इक ये घर जिस घर में मेरा साज़-ओ-सामाँ रहता है, इक वो घर जिसमें मेरी बूढ़ी नानी रहती थीं। जावेद अख़्तर
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सारी भोली बातें रहती थीं!
इक ये दिन जब ज़हन में सारी अय्यारी की बातें हैं, इक वो दिन जब दिल में सारी भोली बातें रहती थीं। जावेद अख़्तर
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पलकें बोझल रहती थीं!
इक ये दिन जब जागी रातें दीवारों को तकती हैं, इक वो दिन जब शामों की भी पलकें बोझल रहती थीं। जावेद अख़्तर
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सारी सड़कें रूठी रूठी लगती हैं!
इक ये दिन जब सारी सड़कें रूठी रूठी लगती हैं, इक वो दिन जब ‘आओ खेलें’ सारी गलियाँ कहती थीं| जावेद अख़्तर
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इक ये दिन जब–
इक ये दिन जब अपनों ने भी हमसे रिश्ता तोड़ लिया, इक वो दिन जब पेड़ की शाख़े बोझ हमारा सहती थीं| जावेद अख़्तर
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मुझको यक़ीं है!
मुझको यक़ीं है सच कहती थीं जो भी अम्मी कहती थीं, जब मेरे बचपन के दिन थे चाँद में परियाँ रहती थीं| जावेद अख्तर
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लो चांद निकल आया!
आज एक गीत फिल्म ‘एक बार मुस्कुरा दो’ से, हमारे प्रिय गायक मुकेश जी और आशा भौंसले जी के मधुर युगल स्वरों में, इसका संगीत तैयार किया है ओ. पी.नैयर जी ने और गीत लिखा था एस एच बिहारी जी ने| आशा जी और मुकेश जी का यह रोमांटिक युगल गीत आज भी हमारे मन…
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चंचल लड़की जैसी मां!
बांट के अपना चेहरा, माथा, आँखें जाने कहाँ गई|फटे पुराने इक अलबम में, चंचल लड़की जैसी मां| निदा फ़ाज़ली