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अच्छी-सी जगह ढूंढ रहे हैं!
ईमां की तिजारत के लिए इन दिनों हम भी,बाज़ार में अच्छी-सी जगह ढूंढ रहे हैं| राजेश रेड्डी
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अपना पता ढूंढ रहे हैं!
पहले तो ज़माने में कहीं खो दिया ख़ुद को,आईने में अब अपना पता ढूंढ रहे हैं| राजेश रेड्डी
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अपना ख़ुदा ढूंढ रहे हैं!
पूजा में, नमाज़ों में, अज़ानों में, भजन में,ये लोग कहाँ अपना ख़ुदा ढूंढ रहे हैं| राजेश रेड्डी
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सिरा ढूंढ रहे हैं!
दुनिया को समझ लेने की कोशिश में लगे हम,उलझे हुए धागों का सिरा ढूंढ रहे हैं| राजेश रेड्डी
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वफ़ा ढूंढ रहे हैं!
इस अहद के इंसां मे वफ़ा ढूंढ रहे हैं,हम ज़हर की शीशी मे दवा ढूंढ रहे हैं| राजेश रेड्डी
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वह झंकार है कविता!
नीलम सिंह जी एक सृजनशील कवियित्री हैं, उनके एक गीत की पंक्तियां मुझे अक्सर याद आती हैं- धूप, धुआँ, पानी में,ऋतु की मनमानी में,सूख गए पौधे तोमन को मत कोसना,और काम सोचना| आज प्रस्तुत है नीलम सिंह जी की एक और प्रभावशाली कविता, जो वास्तव में ‘कविता’ की क्षमता और प्रभाविता के बारे में ही…
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ले के गिरेबाँ का तार तार चले!
हुज़ूर-ए-यार हुई दफ़्तर-ए-जुनूँ की तलब,गिरह में ले के गिरेबाँ का तार तार चले| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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तुम्हारे नाम पे आयेंगे!
बड़ा है दर्द का रिश्ता ये दिल गरीब सही,तुम्हारे नाम पे आयेंगे ग़म-गुसार चले| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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जो कू-ए-यार से निकले तो–
मकाम ‘फ़ैज़’ कोई राह में जँचा ही नहीं,जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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जो हम पे गुज़री सो गुज़री!
जो हम पे गुज़री सो गुज़री मगर शब-ए-हिज्राँ,हमारे अश्क तेरी आकबत सँवार चले| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़