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कभी कभी !
हिन्दी काव्य मंचों के अत्यंत कुशल गीतकार स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी के कुछ गीत मैंने पहले भी शेयर किए हैं, हिन्दी गीत साहित्य में उनका अमूल्य योगदान रहा है|आज मैं स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूं- कभी कभी जब मेरी तबियतयों ही घबराने लगती है,तभी ज़िन्दगी मुझे न जानेक्या-क्या समझाने…
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उसे हवा कर दे!
मैं उस के जोर को देखूँ वो मेरा सब्र-ओ-सुकूँ,मुझे चराग़ बना दे उसे हवा कर दे| राना सहरी
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रस्ता हरा भरा कर दे!
ये रेत्ज़ार कहीं ख़त्म ही नहीं होता,ज़रा सी दूर तो रस्ता हरा भरा कर दे| राना सहरी
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उसे मेरा कर दे!
है इख़्तियार में तेरे तो मोजेज़ा कर दे,वो शख़्स मेरा नहीं है उसे मेरा कर दे| राना सहरी
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तेरी याद को शबनम की तरह!
मैंने ख़ुशबू की तरह तुझ को किया है महसूस,दिल ने छेड़ा है तेरी याद को शबनम की तरह| राना सहरी
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मोहर्रम की तरह!
मेरे महबूब मेरे प्यार को इल्ज़ाम न दे,हिज्र में ईद मनाई है मोहर्रम की तरह| राना सहरी
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बदलते हुए मौसम की तरह!
कभी ग़ुंचा कभी शोला कभी शबनम की तरह,लोग मिलते हैं बदलते हुए मौसम की तरह| राना सहरी
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देखेगा कौन?
हिन्दी नवगीत आंदोलन के प्रणेता स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी, हिन्दी गीत साहित्य में अपने योगदान के लिए हमेशा याद किए जाएंगे| आज मैं स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूं- बगिया में नाचेगा मोर,देखेगा कौन?तुम बिन ओ मेरे चितचोर,देखेगा कौन? नदिया का यह नीला जल, रेतीला घाट,झाऊ की झुरमुट के बीच,…