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महकते हैं शिवालों की तरह!
गुनगुनाते हुए और आ कभी उन सीनों में,तेरी खातिर जो महकते हैं शिवालों की तरह| जां निसार अख़्तर
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तेरे गालों की तरह!
और क्या उसमें जियादा कोई नर्मी बरतूं,दिल के जख्मों को छुआ है तेरे गालों की तरह| जां निसार अख़्तर
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जहर के प्यालों की तरह!
तेरे बिन, रात के हाथों पे ये तारों के अयाग,खूबसूरत हैं मगर जहर के प्यालों की तरह| जां निसार अख़्तर
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नींद-सी आंखों में घुली जाती है!
खुद-ब-खुद नींद-सी आंखों में घुली जाती है,महकी-महकी है शब-ए-गम तेरे बालों की तरह| जां निसार अख़्तर
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हमसे भागा न करो, दूर!
हमसे भागा न करो, दूर ग़ज़ालों की तरह,हमने चाहा है तुम्हें चाहने वालों की तरह| जाँ निसार अख़्तर
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दीपक जलता रहा रात भर!
स्वर्गीय गोपाल सिंह नेपाली जी अपने समय में हिन्दी काव्य मंचों के एक प्रमुख कवि थे| मुझ जैसे पुराने काव्य-प्रेमी लोग, जो वर्तमान में सृजन और रचनाकारों से सक्रिय रूप से जुड़े नहीं हैं, विशेष रूप से गोवा में आकार बस जाने के बाद, पुराने कवियों की रचनाएं ही सबसे बड़ी धरोहर हैं| लीजिए आज…
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इक फूल देके आया था!
मैं जिसके हाथ में इक फूल देके आया था,उसी के हाथ का पत्थर मेरी तलाश में है| कृष्ण बिहारी ‘नूर’
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मैं देवता की तरह क़ैद!
मैं देवता की तरह क़ैद अपने मंदिर में,वो मेरे जिस्म के बाहर मेरी तलाश में है| कृष्ण बिहारी ‘नूर’
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मैं एक कतरा हूँ–
मैं एक कतरा हूँ मेरा अलग वजूद तो है,हुआ करे जो समंदर मेरी तलाश में है| कृष्ण बिहारी ‘नूर’
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दिया जलाये जो दर पर!
ये मेरे घर की उदासी है और कुछ भी नहीं,दिया जलाये जो दर पर मेरी तलाश में है| कृष्ण बिहारी ‘नूर’