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यादों की चादर तान लेते हैं!
तबीयत अपनी घबराती है जब सुनसान रातों में, हम ऐसे में तेरी यादों की चादर तान लेते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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जान और ईमान लेते हैं!
मेरी नज़रें भी ऐसे क़ातिलों का जान ओ ईमां हैं, निगाहें मिलते ही जो जान और ईमान लेते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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दूर से पहचान लेते हैं!
बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं, तुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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कविता कैसे लिखते हो तुम!
राजनैतिक विचार देने में अक्सर संकट शामिल होता है, लेकिन मुझे लगता है कि यह काम भी कभी-कभी करना चाहिए, भले ही वह धारा के विरुद्ध जाता हो| एक फैशन सा बन गया है कि जिन कवियों की वाणी से आपातकाल के विरुद्ध एक शब्द नहीं निकल पाया, आज वे जी भरकर सरकार को गालियां…