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मिसरे उसी ग़ज़ल के हैं!
जो आधे में छूटी हम,मिसरे उसी ग़ज़ल के हैं। बिछे पाँव में क़िस्मत है,टुकड़े तो मखमल के हैं। बालस्वरूप राही
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मेरी आवाज़ ही, पहचान है!
लीजिए लता जी को विदा करने का समय भी आ गया| एक ज़माना रहा फिल्म संगीत का, जिसमें रफी साहब रहे, मुकेश जी, किशोर दा, हेमंत कुमार जी, मन्ना डे साहब आदि अनेक पुरुष गायक थे, महिला गायिकाएं भी अनेक रहीं जिनमें लता जी की छोटी बहन आशा भौंसले जी, सुमन कल्याणपुर जी, गीता दत्त…
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मिलता है कोई काफ़िर!
‘फ़िराक़’ अक्सर बदल कर भेस मिलता है कोई काफ़िर, कभी हम जान लेते हैं कभी पहचान लेते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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ऐ दोस्त हर एहसान लेते हैं!
तुझे घाटा न होने देंगे कारोबार-ए-उल्फ़त में, हम अपने सर तेरा ऐ दोस्त हर एहसान लेते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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जिस तरह मा’नी जान लेते हैं!
जिसे सूरत बताते हैं पता देती है सीरत का, इबारत देखकर जिस तरह मा’नी जान लेते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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जो दिल में ठान लेते हैं!
ख़ुद अपना फ़ैसला भी इश्क़ में काफ़ी नहीं होता, उसे भी कैसे कर गुज़रें जो दिल में ठान लेते हैं| फ़िराक़ गोरखपुरी