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आपका इक सौदाई भी!
दो दो शक़्लें दिखती हैं इस बहके से आईने में,मेरे साथ चला आया है आपका इक सौदाई भी| गुलज़ार
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माज़ी की रुसवाई भी!
यादों की बौछारों से जब पलकें भीगने लगती हैं,कितनी सौंधी लगती है तब माज़ी की रुसवाई भी| गुलज़ार
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वो भी हों तनहाई भी!
एक पुराना मौसम लौटा याद भरी पुरवाई भी,ऐसा तो कम ही होता है वो भी हों तनहाई भी| गुलज़ार
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मेरे मन-मिरगा नहीं मचल
आज एक बार फिर मैं अपने अत्यंत प्रिय गीतकार स्वर्गीय भारत भूषण जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| कुल मिलाकर गीत अक्सर भावुकता का ही व्यापार होते हैं, जैसे नीरज जी ने लिखा – ‘हूँ बहुत नादान करता हूँ ये नादानी, बेचकर खुशियां खरीदूँ आँख का पानी’ या भारत भूषण जी ने ही…
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मन में घुलती रही–
हम तुम्हारे हैं ‘कुँअर’ उसने कहा था इक दिन,मन में घुलती रही मिसरी की डली मीलों तक| कुंवर बेचैन
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तेरी बात चली मीलों तक!
मैं हुआ चुप तो कोई और उधर बोल उठा,बात यह है कि तेरी बात चली मीलों तक| कुंवर बेचैन
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इक पीर पली मीलों तक!
माँ के आँचल से जो लिपटी तो घुमड़कर बरसी,मेरी पलकों में जो इक पीर पली मीलों तक| कुंवर बेचैन
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चली साथ में बिटिया की हँसी!
घर से निकला तो चली साथ में बिटिया की हँसी,ख़ुशबुएँ देती रही नन्हीं कली मीलों तक| कुंवर बेचैन
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प्यार में कैसी थकन!
प्यार में कैसी थकन कहके ये घर से निकली,कृष्ण की खोज में वृषभानु-लली मीलों तक| कुंवर बेचैन
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दुख की गली मीलों तक!
प्यार का गाँव अजब गाँव है जिसमें अक्सर,ख़त्म होती ही नहीं दुख की गली मीलों तक| कुंवर बेचैन