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सूरज कभी निकलेगा ‘नज़ीर!
इन अंधेरों से ही सूरज कभी निकलेगा ‘नज़ीर’,रात के साये जरा और निखर जाने दे। नज़ीर बाक़री
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मोती भी बिखर जाने दे!
ज़िंदगी मैंने इसे कैसे पिरोया था न सोच,हार टूटा है तो मोती भी बिखर जाने दे। नज़ीर बाक़री
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मगर जाने दे!
ज़ख़्म कितने तेरी चाहत से मिले हैं मुझको,सोचता हूँ कि कहू तुझसे, मगर जाने दे। नज़ीर बाक़री
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आँसू मेरे दामन पे बिखर जाने दे!
आग दुनिया की लगाई हुई बुझ जाएगी,कोई आँसू मेरे दामन पे बिखर जाने दे। नज़ीर बाक़री
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कोई ज़ख़्म तो भर जाने दे!
ऐ नये दोस्त मैं समझूँगा तुझे भी अपना,पहले माज़ी का कोई ज़ख़्म तो भर जाने दे| नज़ीर बाक़री
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मुझे डूब के मर जाने दे!
अपनी आँखों के समंदर मैं उतर जाने दे,तेरा मुजरिम हूँ मुझे डूब के मर जाने दे| नज़ीर बाक़री
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नाव जर्जर ही सही!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के एक प्रमुख कवि स्वर्गीय दुष्यंत कुमायर जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ | दुष्यंत जी हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि थे, लेकिन वे जनकवि तब बने जब आपातकाल के दौरान उनकी एक के बाद एक ग़ज़लें सामने आईं, प्रारंभ में कमलेश्वर जी ने कथा पत्रिका सारिका…
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अपनी बात सुनाई भी!
ख़ामोशी का हासिल भी इक लम्बी सी ख़ामोशी है,उनकी बात सुनी भी हमने अपनी बात सुनाई भी| गुलज़ार