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काग़ज़ थे अश्कों से भीगे हुए!
हम जो काग़ज़ थे अश्कों से भीगे हुए,क्यों चिराग़ों की लौ तक हवा ले गई| बशीर बद्र
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मुठ्ठी में सूखे हुए फूल हैं!
मेरी मुठ्ठी में सूखे हुए फूल हैं,ख़ुशबुओं को उड़ाकर हवा ले गई| बशीर बद्र
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हम फ़क़ीरों से क्या ले गई!
सर से चादर बदन से क़बा ले गई,ज़िन्दगी हम फ़क़ीरों से क्या ले गई| बशीर बद्र
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चंदन है तो महकेगा ही!
एक बार फिर से मैं आज स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| रमानाथ अवस्थी जी एक श्रेष्ठ गीतकार थे और उन्होंने मन की कोमल भावनाओं को हमेशा बहुत सुंदर तरीके से व्यक्त किया है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का यह गीत – चंदन है तो महकेगा…
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समन्दर काहे शोर मचायेगा!
सूख गई जब इन आँखों में प्यार की नीली झील “क़तील”,तेरे दर्द का ज़र्द समन्दर काहे शोर मचायेगा| क़तील शिफ़ाई
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सर मेरा झुक जायेगा!
मेरे बाद वफ़ा का धोखा और किसी से मत करना,गाली देगी दुनिया तुझको सर मेरा झुक जायेगा| क़तील शिफ़ाई
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मुझको सारी रात डरायेगा!
दिन में हँसकर मिलने वाले चेहरे साफ़ बताते हैं,एक भयानक सपना मुझको सारी रात डरायेगा| क़तील शिफ़ाई
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पत्थर का हो जायेगा !
लोगो मेरे साथ चलो तुम जो कुछ है वो आगे है,पीछे मुड़ कर देखने वाला पत्थर का हो जायेगा| क़तील शिफ़ाई