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ये ख़ामोशी कहाँ तक पहुंचे!
इतना मालूम है, ख़ामोश है सारी महफ़िल,पर न मालूम, ये ख़ामोशी कहाँ तक पहुंचे । गोपालदास “नीरज”
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ऐ यार ! वहाँ तक पहुंचे!
हम तेरी चाह में, ऐ यार ! वहाँ तक पहुंचे।होश ये भी न जहाँ है कि कहाँ तक पहुंचे। गोपालदास “नीरज”
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जो अगर-मगर में रहा!
हज़ारों रत्न थे उस जौहरी की झोली में,उसे न कुछ भी मिला जो अगर-मगर में रहा । गोपालदास “नीरज”
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रोटी की ही ख़बर में रहा!
वो और ही थे जिन्हें थी ख़बर सितारों की,मेरा ये देश तो रोटी की ही ख़बर में रहा । गोपालदास “नीरज”
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मीरा की चश्मे-तर में रहा!
तू ढूँढ़ता था जिसे जा के बृज के गोकुल में,वो श्याम तो किसी मीरा की चश्मे-तर में रहा । गोपालदास “नीरज”
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हमेशा तेरी डगर में रहा!
वो जिस्म ही था जो भटका किया ज़माने में,हृदय तो मेरा हमेशा तेरी डगर में रहा । गोपालदास “नीरज”
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अजनबी के घर में रहा!
तमाम उम्र मैं इक अजनबी के घर में रहा ।सफ़र न करते हुए भी किसी सफ़र में रहा । गोपालदास “नीरज”
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दिल चुरा कर न हमको !
स्वर्गीय गोपाल सिंह ‘नेपाली’ जी की एक रूमानी कविता आज शेयर कर रहा हूँ| नेपाली जी अपने समय के सुरीले कवियों, गीतकारों में गिने जाते थे और कवि सम्मेलनों में उनका काव्य पाठ सुनने के लिए भी श्रोता लालायित रहते थे| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गोपाल सिंह ‘नेपाली’ जी की यह कविता– दिल चुरा…