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बेकार हमें ग़म होता है!
सच ये है बेकार हमें ग़म होता है,जो चाहा था दुनिया में कम होता है| जावेद अख़्तर
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लेकिन मेरा लावारिस दिल!
आज मैं स्वर्गीय राही मासूम रज़ा साहब की एक नज़्म शेयर कर रहा हूँ| राही मासूम रज़ा साहब एक प्रतिष्ठित साहित्यकार थे तथा उनको अनेक साहित्यिक सम्मानों के अलावा पद्मश्री और पद्मभूषण जैसे अलंकरणों से भी सम्मानित किया गया था| उनके उपन्यास ‘दिल एक सादा कागज’, ‘आधा गांव’ आदि को पढ़ते हुए भी कभी कभी…
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इन्सान कहाँ तक पहुंचे!
चांद को छूके चले आए हैं विज्ञान के पंख,देखना ये है कि इन्सान कहाँ तक पहुंचे। गोपालदास “नीरज”
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मेरी आवाज़ वहां तक पहुंचे!
एक इस आस पे अब तक है मेरी बन्द जुबां,कल को शायद मेरी आवाज़ वहां तक पहुंचे। गोपालदास “नीरज”