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हारो न खुद को तुम!
दुनिया न जीत पाओ तो हारो न खुद को तुम,थोड़ी बहुत तो ज़ेहन में नाराज़गी रहे। निदा फ़ाज़ली
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नये-पुराने शहरों में!
हमने भी सोकर देखा है नये-पुराने शहरों में,जैसा भी है अपने घर का बिस्तर अच्छा लगता है । निदा फ़ाज़ली
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सबके अपने-अपने साँचे हैं!
चाहत हो या पूजा सबके अपने-अपने साँचे हैं,जो मूरत में ढल जाये वो पैकर अच्छा लगता है| निदा फ़ाज़ली
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सन्नाटों में बोलनेवाला-
मेरे आंगन में आये या तेरे सर पर चोट लगे,सन्नाटों में बोलनेवाला पत्थर अच्छा लगता है। निदा फ़ाज़ली
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आज हैं केसर रंग रंगे वन!
आज मैं तारसप्तक के एक प्रमुख कवि स्वर्गीय गिरिजा कुमार माथुर जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| गिरिजा कुमार माथुर जी को साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त हुए थे| इस कविता में वसंत के सौन्दर्य को बड़े प्रभावी ढंग से चित्रित किया गया है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय…
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जिससे अब तक मिले नहीं वो-
मिलने-जुलनेवालों में तो सारे अपने जैसे हैं,जिससे अब तक मिले नहीं वो अक्सर अच्छा लगता है । निदा फ़ाज़ली
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अब घर अच्छा लगता है!
नयी-नयी आँखें हों तो हर मंज़र अच्छा लगता है,कुछ दिन शहर में घूमे लेकिन, अब घर अच्छा लगता है। निदा फ़ाज़ली
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पके खेत सी शादाब लगे!
घर के आंगन मैं भटकती हुई दिन भर की थकन,रात ढलते ही पके खेत सी शादाब लगे| निदा फ़ाज़ली
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खिड़की निकले कहीं मेहराब लगे!
अभी बे-साया है दीवार कहीं लोच न ख़म,कोई खिड़की कहीं निकले कहीं मेहराब लगे| निदा फ़ाज़ली