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खुशबू सी आ रही है इधर!
खुशबू सी आ रही है इधर ज़ाफ़रान की,खिडकी खुली है गालिबन उनके मकान की| गोपालदास ‘नीरज’
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छान के फटक के मुझे!
मैं देर रात गए जब भी घर पहुँचता हूँ,वो देखती है बहुत छान के फटक के मुझे| राहत इन्दौरी
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इशारा कर दिया उसने!
बहुत सी नज़रें हमारी तरफ हैं महफ़िल में,इशारा कर दिया उसने ज़रा सरक के मुझे| राहत इन्दौरी
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ये एक जुगनू ने समझा दिया!
हमें खुद अपने सितारे तलाशने होंगे,ये एक जुगनू ने समझा दिया चमक के मुझे| राहत इन्दौरी
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कमज़र्फ ने छलक के मुझे!
तआल्लुकात में कैसे दरार पड़ती है,दिखा दिया किसी कमज़र्फ ने छलक के मुझे| राहत इन्दौरी
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परेशां करता है ये दिल!
कोई बताये के मैं इसका क्या इलाज करूँ,परेशां करता है ये दिल धड़क धड़क के मुझे| राहत इन्दौरी
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जगा दिया तेरी पाज़ेब ने!
सुला चुकी थी ये दुनिया थपक थपक के मुझे,जगा दिया तेरी पाज़ेब ने खनक के मुझे| राहत इन्दौरी
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बादल-बादल भटकाया हमको!
आज फिर से मैं एक श्रेष्ठ गीतकार, सरल व्यक्तित्व के धनी और मेरे लिए बड़े भाई जैसे स्वर्गीय किशन सरोज जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| किशन जी प्रेम के अनूठे कवि थे, यह रचना कुछ अलग तरह की है लेकिन उतनी ही प्रभावशाली है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय किशन सरोज जी…