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बहुत तेज़ क़दम आते हैं !
कोई लश्कर है के बढ़ते हुए ग़म आते हैं |शाम के साये बहुत तेज़ क़दम आते हैं || बशीर बद्र
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हज़ारों साल की कोई इमारत सी!
उदासी पतझड़ों की शाम ओढ़े रास्ता तकती |पहाड़ी पर हज़ारों साल की कोई इमारत सी || बशीर बद्र
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मगर कैसी हिक़ारत सी!
वो जैसे सर्दियों में गर्म कपड़े दे फ़क़ीरों को |लबों पे मुस्कुराहट थी मगर कैसी हिक़ारत सी || बशीर बद्र
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बच्चों की कापी में इबारत सी!
हँसी मासूम सी बच्चों की कापी में इबारत सी,हिरन की पीठ पर बैठे परिन्दे की शरारत सी| बशीर बद्र
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कठपुतली!
स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी अपनी तरह के अनूठे रचनाकार थे जो बड़ी सरलता से, बातचीत के लहज़े में बहुत गहरी बात कह जाते थे| भवानी दादा को अनेक प्रतिष्ठित सम्मान और पुरस्कार प्राप्त हुए थे लेकिन यह भी सत्य है कि फिल्मों की मायानगरी में वे एडजस्ट नहीं हो पाए थे और वहां उन्होंने…
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जुबां है किसी बेजुबान की!
जुल्फों के पेंचो-ख़म में उसे मत तलाशिये,ये शायरी जुबां है किसी बेजुबान की| गोपालदास ‘नीरज’
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रौशनी अपने मकान की!
औरों के घर की धूप उसे क्यूँ पसंद होबेची हो जिसने रौशनी अपने मकान की| गोपालदास ‘नीरज’
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ज्यों लूट ले कहार ही-
ज्यों लूट ले कहार ही दुल्हन की पालकी,हालत यही है आजकल हिन्दुस्तान की| गोपालदास ‘नीरज’
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शुरुआत मेरी दास्तान की!
बुझ जाये सरे आम ही जैसे कोई चिराग,कुछ यूँ है शुरुआत मेरी दास्तान की| गोपालदास ‘नीरज’
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जमीन पे छत आसमान की!
हारे हुए परिन्दे ज़रा उड़ के देख तो,आ जायेगी जमीन पे छत आसमान की| गोपालदास ‘नीरज’